National Parks & Sancturies


छत्तीसगढ़ के राष्ट्रीय उद्यान एवं अभ्यारण्य


छत्तीसगढ अपनी संपन्न जैवविविधता के कारण वन्यजीव प्रेमियों एवं शिकारियों दोनों के लिए ही सदियों से प्रिय रहा है। पुराने ऑकडे पर दृष्टिपात किया जाय तो ज्ञात होता है कि बाघों का सबसे अधिक शिकार मध्य भारत में ही किया गया। आज भी प्रदेश का वन्यजीव अनुपम है। 

औद्योगिकरण एवं शहरीकरण के कारण वनों का विनाश तीव्र गति से हो रहा है। वैज्ञानिक प्रयोगों व चिकित्सा के क्षेत्र में अर्जित सफलता से मृत्युदर में कमी हो रही है और जनसंख्या का बढ ता दबाव, औद्योगिक विकास एवं वाहनों की संख्या में हो रही बेतहाशा वृद्धि से उत्पन्न प्रदूषण विश्व के लिए एक गंभीर समस्या और मानव जीवन के लिये चुनौती बनता जा रहा है। वनों के विनाश के साथ साथ वन्यजीवों पर भी इसका प्रतिकूल असर पड रहा है। विश्व में सैकडो वन्यजीवों की प्रजातियां लुप्त होने की स्थिति में है। भारत की क्या अपितु छत्तीसगढ में भी कुछ स्तनपायी प्रजाति के वन्यजीव लुप्त होने की कगार पर है, जिसमें शेर व वन भैंसा प्रमुख है।

जैसा कि सभी जानते है कि मानव जीवन का अस्तित्व वनों व वन्यप्राणियों के अस्तित्व पर निर्भर है क्योंकि सब पारिस्थितिकी तंत्र द्वारा एक सार्वभौमिक विधि से एक दूसरे से जुडे है। मानव तथा वन परस्पर पूरक होने के नाते वनों एवं वन्यप्राणियों का संवर्धन एवं संरक्षण अतिमहत्वपूर्ण है। भारत सरकार ने पी.ए.एस. (प्रोटेक्टेड एरियाज) द्वारा देश में राष्ट्रीय उद्यानों और अभयारण्यों को विकसित कर वन्यजीवों एवं वनों की सुरक्षा के लिये एक कार्यक्रम तैयार किया है। इस कार्यक्रम के तहत भारत में राष्ट्रीय उद्यानों की संख्या तथा अभयारण्यों की संख्या का कुल क्षेत्रफल देश के भौगोलिक क्षेत्रफल के ६ प्रतिशत क्षेत्र को सुरक्षित करने की योजना है। वर्तमान में देश के समस्त राष्टीय उद्यानों एवं अभ्यारण्यों का क्षेत्रफल देश के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का ४.५ प्रतिशत तथा वनाच्छित क्षेत्रफल का १९.२० प्रतिशत है।

राष्ट्रीय उद्यानों और अभयारण्यों से सिर्फ वन्यजीवों का संरक्षण भर नहीं होता, देश की जैवविविधता के संरक्षण के साथ-साथ ये प्रकृति की अनोखी दुनिया यानि हमारी अमूल्य राष्ट्रीय धरोहर वन्यजीवों को भी संजोकर रखे हुये है। वास्तव में ये राष्ट्रीय उद्यान और अभयारण्य ही देश के ऐसे संरक्षित वन है जहां वन्यजीव और वनस्पति दोनों ही सुरक्षित है। वनों को उनके वास्तविक स्वरूप में देखने का अवसर सिर्फ राष्ट्रीय उद्यानों में ही मिलता है, जहां पर वन्यजीवों को उनके नैसर्गिक वातावरण में देखा जा सकता है। इसके अतिरिक्त राष्ट्रीय उद्यानों एवं अभयारण्यों के रूप में संरक्षित ये वन क्षेत्र पर्यटकों के मनोरंजन, ज्ञानवध्रन, पर्यावरण चेतना, विकास अध्ययन एवं शोध कार्य के लिये भी अति उपयोगी सिद्ध हो रहे है। एक ओर जहां प्रतिवर्ष करोड़ो वृक्ष कट रहे है वहां यह आवश्यक हो जाता है कि वनों एवं वन्यप्राणियों को समूल नष्ट होने से बचाया जाये और यह तभी संभव है, जब नये-नये अभयारण्यों और राष्ट्रीय उद्यानों की स्थापना की जाये।

अभ्‍यारण्य की अवधारणा भारतीय संस्कृति में काफी पुरानी है। सम्राट अशोक के शासनकाल में भी वन्यजीवों के लिये इस तरह अभयवन बनाये जाते थे। प्रसिद्ध अर्थशास्त्री एवं दार्शनिक कौटिल्य ने अपने ऐतिहासिक ग्रंथ अर्थशास्त्र में अभयारण्य की सजीव एवं विस्तृत व्याख्या की है। संक्षेप में कौटिल्य के अनुसार अभयारण्य वह वन है जहां पर वन्यजीव बिना किसी भय के अपने प्राकृतिक रहवास में निर्भय होकर विचरण करते है।

जैसा कि शब्द से स्पष्ट है कि अभयारण्य दो शब्दों के योग से बना है, अभय + अरण्य । अभय का अर्थ है भयरहित और अरण्य का अर्थ है वन । इसलिये अभयारण्य का शाब्दिक अर्थ है वन्यजीवों की प्राकृतिक एवं सुरक्षित शरणस्थली। जिसे दूसरे शब्दों में कहा जाये तो ऐसा आरक्षित वन या वन क्षेत्र जहां वन्यप्राणी बिना किसी भय के स्वच्छंद विचरण और निवास करते है। राष्ट्रीय उद्यान भी इसी श्रेणी में आते है। अंतर्राष्ट्रीय वर्गीकरण के अनुसार आई.यू.सी.एन. की मान्यता प्राप्त १० श्रेणियां हे, जिसमें भारत के राष्ट्रीय उद्यान (श्रेणी द्वितीय) अभयारण्य (श्रेणी चतुर्थ) तथा जैवसंरक्षित क्षेत्र (श्रेणी षष्टम) में शामिल किये गये है।

छत्तीसगढ़ एक ऐसा राज्य है जहां सबसे अधिक वन संपदा एवं वन्यप्राणि है। इनके संरक्षण एवं संवर्धन के लिए वन विभाग कटिबंध है। संरक्षण के इस प्रयास को पूर्ण हेतु समाज के सभी वर्ग के लोगों को हाथ से हाथ मिलाकर प्रकृति की इस धरोहर को बचाने का प्रयत्न करना है तभी हमारा प्रयास सार्थक होगा। इस प्रस्तक के माध्यम से विभाग का यह प्रयास है कि छत्तीसगढ के वन संपदा एवं वन्यप्राणियों के बारे में जानकारी अधिक से अधिक लोगों को मिल सके ताकि वे संरक्षण में विभाग का हाथ बटा सके।

राष्ट्रिय उद्यान

अभ्यारण्य

चिडियाघर एवं उद्यान     

इंदरावती राष्ट्रीय उद्यान    

अचानकमार अभ्यारण्य    

इंदिरा उद्यान     

कांगेरघाटी राष्ट्रीय उद्यान    

बादलखोल अभ्यारण्य    

कानन पेण्डारी मिनी चिड़ियाघर     

गुरू घासीदास राष्ट्रीय उद्यान    

बारनवापारा अभ्यारण्य     

 

 

सेमरसोत अभ्यारण्य     

 

 

सीतानदी अभ्यारण्य     

 

 

तमोर पिंगला अभ्यारण्य  

 

 

भैरमगढ़ अभ्यारण्य     

 

 

भोरमदेव अभ्यारण्य     

 

 

गोमर्डा अभ्यारण्य     

 

 

पामेड़ अभ्यारण्य     

 

 

उदन्ती अभयारण्य     

 



इंदरावती राष्ट्रीय उद्यान


इंदरावती राट्रीय उद्यान बीजापुर से ५० कि.मी. दूर (जगदलपुर- भोपाल-पटनम मार्ग पर) स्थित है। यह दंतेवाड़ा जिले के अंतर्गत आता है। इस राष्ट्रीय उद्यान का नाम इंदरावती नदी पर रखा गया है जो इस उद्यान से होकर बहती है एवं छत्तीसगढ  एवं महाराट्र की सीमा बनाती है। राष्ट्रीय उद्यान का कुल क्षेत्रफल २७९९.०८६ वर्ग कि.मी. है एवं इसकी स्थापना सन्‌ १९७५ में हुई एवं इसे प्रोजेक्ट टाईगर के अंतर्गत भी शामिल किया गया है। इस राष्ट्रीय उद्यान के अंदर ५६ राजस्व ग्राम स्थित है जिनमें गोड  हलबा माडिया मुहिया आदि जन जाति के लोग निवास करते है। 
इस संरक्षित क्षेत्र में सागौन एवं मिश्रित प्रजाति के वन पाये जाते है जिनमें १०२ प्रकार के वृक्ष २८ प्रकार की लताऐं ४६ प्रकार की झाडि यां बांस फ्‌रन एवं ब्रायोफाईट पाये जाते है। जैसे - सागौन शिसम साजा सलई हल्दू सेन्हा तिनसा जामुन तेन्दू धावडा बीजा साल चार आदि। इसके अतिरिक्त शेर तेन्दूआ वन भैंसा नीलगाय चीतल सांभर बारकिंग डियर भालू जंगली सुअर गौर मोर आदि वन्यप्राणी इस राष्ट्रीय उद्यान में देखें जा सकते है। 
दर्शनीय स्थल 
रूभद्रकाली: भोपालपटनम से ७० कि.मी. की दूरी पर भद्रकाली नामक स्थान पर इंदरावती एवं गोदावरी नदी का संगम है। यह स्थान बहुत ही खुबसूरत है। पर्यटक इस स्थान पर पिकनीक का आनंद लेते है।
सामान्य जानकारी  इंदरावती राष्ट्रीय उद्यान

क्षेत्रफल :  

2799.086 वर्ग. कि.मी.

स्थिति :  

बीजापुर से 50 कि.मी. (जगदलपुर- भोपाल-पटनम मार्ग)

अक्षांश :

180-51दक्षिण से  190-24 दक्षिण

देशांश :

800-16 पूर्व   से  800-44 पूर्व

स्थापना वर्ष :

1975; वर्ष 1981 में प्रोजेक्ट टाईगर में शामिल किया गया।

मुख्यालय :  

संचालक इंदरावती राष्ट्रीय उद्यान , जगदलपुर छत्तीसगढ़ भारत

उपसंचालक :

इंदरावती राष्ट्रीय उद्यान , बीजापुर

तापमान :

न्यूनतम :   30 सेल्सियस    अधिकतम : 450 सेल्सियस

वर्षा :  

1500- 1700 से.मी.

समुद्र तल से ऊंचाई :

211से 607 मी. एम.एस.एल.

भ्रमण का समय :

नवंबर से   जून      ( भ्रमण के लिए उपयुक्त समय :   मार्च से जून)

ठहरने की व्यवस्था 

वन विश्राम गृह , कुटरू :

2 सुट्स

वन विश्राम गृह , बीजापुर:

2 सुट्स   

निरीक्षण कुटीर , फरसेगढ  :

1 सुट्स

आरक्षण :

संचालक , इंदरावती राष्ट्रीय उद्यान , जगदलपुर , छत्तीसगढ   भारत / उपसंचालक इंदरावती राष्ट्रीय उद्यान , बीजापुर।  

वाहन सुविधा :

पर्यटक अपने लिये जीप , कार जगदलपुर एवं बीजापुर से किराये पर ले सकते है। वर्तमान में कोई भी   शासकीय वाहन पर्यटकों के लिए उपलब्ध नही है।

निरीक्षण कुटीर , सेन्ड्रा :

1 सुट्स

रेल्वे स्टेशन :

जगदलपुर         -         212 कि.मी.

एयरपोर्टः

रायपुर             -          512 कि.मी. 
जगदलपुर         -          212कि.मी.



कांगेरघाटी राष्ट्रीय उद्यान


कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान जगदलपुर से २४ कि.मी. की दूरी पर स्थित है। इस राष्ट्रीय उद्यान की स्थापना १९८३ में हुई थी। इसका क्षेत्रफल २०० वर्ग कि.मी. है। प्रकृति की जितने भी संभावित और कल्पित रूप की कल्पना हमारे मन मस्तिष्क में छायी हो वह सभी यहां साकार दिखती है । कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान में जल, जंगल, जमीन के ऊपर और नीचे पेड़, पत्थर और पानी की पूरी संस्कृति जन्मी दिखती है । चूंकि ये प्रकृति के साथ मिली संस्कृति है, इसलिये यहां सब कुछ प्राकृतिक और नैसर्गिक लगता है । यहां की भूगर्भित कोटमसर, कैलाश गुफा, दंडक गुफा, देवगिरी गुफा और कांगेर करपन पर्यटकों को सम्मोहन की दुनियां में ले जाती है । इस राष्ट्रीय उद्यान में कागेंर नदी की विभिन्न शाखाऐं सालों भर रहती हैं , एवं कोलाब नदी इसकी सरहद बनाती है जो आगे चल कर शबरी नदी बनती है जो कि गोदावरी नदी से जुड  जाती है।

 इस राष्ट्रीय उद्यान में धावड़ा, हल्दु, तेन्दु, कुल्लू , कर्रा, जामुन, सेन्हा, आम, बहेडा, बांस आदि के वृक्ष पाये जाते हैं, इसके अतिरिक्त सफेद मूसली , काली मूसली , तेजराज, सतावर, रामदतौन, जंगली प्याज, जंगली हल्दी, तिखुर, सर्पगंधा आदी औषद्यिय पौधे भी पाये जाते हैं। इसके अतिरिक्त यहां बेंत, साल एवं सागौन के भी वृक्ष पाये जाते है। वन्य प्राणियों में शेर, तेन्दुआ, चितल, सांभर, लकड बघा,जंगली भालू,काकड , सियार, घड याल, सांप एवं विभिन्न प्रकार के पक्षी पाये जाते है। यह राष्ट्रीय उद्यान तितलीयों, गुफाओं एवं झरनों के लिये प्रसिद्व है। 


दर्शनीय स्थल :  यहां के घने वन, लतायें-कुंज, बांस एवं बेलाओं के झुरमुट, रमणीक पहाडि यां, तितलियां, चहकते पक्षी, रहस्यमयी गुफायें, सुन्दर जलप्रपात, सर्वत्र नदी-नाले में कलख करता जल एवं बिखरे हुए दरहा आपको अपलक निहारने एवं अप्रितम आनन्द में डूब जाने के लिये मजबूर कर देगा ।

1.कोटमसर गुफा :   ये वर्ष १९०० में खोजी गई तथा वर्ष १९५१ में डॉ. शंकर तिवारी ने सर्वेक्षण किया । इसका मुख्य मार्ग ३३० मीटर लम्बा है तथा २० से ७२ मीटर चौड़ा है । इसकी दीवारों पर हाथी की सूंड सी रचनायें (ड्रिप स्टोन) जमीन से उठती (स्टेलेग्माइट) एवं छत से लटकती (स्टेलेक्टाइट) शुभ्र धवल चूने के पत्थर की संरचनायें प्रमुख आकर्षण का केन्द्र है । ये संरचनायें अत्यंत धीमी गति से बनती है तथा इनका बनना अभी भी जारी है । गुफा के निर्माण में प्रकृति को कितना समय लगा होगा, बता पाना कठिन है । गुफा के कई साइड कम्पार्टमेंट है । गुफा के धरातल में कई छोटे-छोटे पोखर है । जिनमें प्रसिद्ध अंधी मछलियां एवं मेंढक पाये जाते है । इसके अतिरिक्त गुफा में अंधेरे में पलनेवाले झींगुर, सांप, मकडी, चमगादड, दीमक आदि पाये जाते है । गुफा के अंत में स्टेलेग्माइट  शिवलिंग है । गुफा में सोलार लेम्प एवं गाइड की सहायता से घूमा जाता है । 

2.कैलाश गुफा : इसकी खोज अप्रेल १९९३ में राष्ट्रीय उद्यान के अधिकारी एवं कर्मचारियों द्वारा की गई । यह गुफा २०० मीटर लंबी एवं ३५-५० मीटर गहरी है । गुफा के अंदर विशाल दरबार हाल है, जिसमें स्टेलेक्टाइट, स्टेलेग्माइट एवं ड्रिप स्टोन की आकर्षक संरचनायें है । 

गुफा के अंदर कैलाश पर्वत के समान नजारा दिखाई देता है । गुफा के भीतर एक म्यूजिक प्वाइंट है, जहां चूने की संरचनाओं को पत्थर से टकरा कर संगीत का आनन्द लिया जा सकता है । गुफा के अंत में शिवलिंग विद्यमान है । गुफा को सौर उर्जा से आलोकित किया गया है ।

3.दंडक गुफा :  इसको अप्रेल १९९५ में श्री रामदास बघेल वन रक्षक के द्वारा खोजा गया । यह गुफा २०० मीटर लंबी १५-२५ मीटर गहरी है । इस गुफा में दो खंड है । प्रथम खंड में प्रवेश करने के पश्चात एक विशाल सभागृह दिखाई देता है । इसमें दैत्याकार ड्रिप स्टोन की ठोस एवं शुभ्र संरचनायें है । दूसरे खंड में पहुंचने के लिये घुटने के बल सरक कर जाना पड़ता है । इसमें गहन अंधकार में डूबा हुआ एक कुंआ सी संरचना हैं तत्‌पश्चात स्टेलेक्टाइट की श्वेत एवं सुन्दर संरचनायें दिखाई देती है । इसमें भी सोलार लेम्प का उपयोग किया जाता है । 

4.तीरथगढ  जलप्रपात :  यह मुनगा बहार नाले पर तीन चरणों में कुल ५० मीटर की उंचाई से गिरता है। जलप्रपात के तीनों चरणों तक नीचे उतरने के लिये कांक्रीट कर सीढि यां बनी हुई है । यहां एक पुराना शिव - पार्वती मंदिर भी है । पर्यअकों के विश्राम के लिये पर्यटक शेड एवं घाटी व जल प्रपात का नजारा लेने के लिये वाच टावर भी बनाये गये है ।

5.कांगेर धारा :  कोटमसर ग्राम के समीप कांगेर नदी लघु जल प्रपात है, जो कई स्थानों पर झरनों के रूप में गिरता है । यहां की पथरीली चट्टानें, उथले जलकुण्ड, वादियां एवं कल-कल अविरल बहते जल प्रवाह की ध्वनि मुख्य आकर्षण है ।

6.भैंसा दरहा :  कांगेर नदी पर चार हेक्ट. क्षेत्र में फेला हुआ विशाल प्राकृतिक झील का जलक्षेत्र है, जिसे भैंसा दरहा कहते है । यह घने बांस के वनों एवं झुरमुटों के बीच स्थित है । कांगेर नदी पार्क में कोटमसर से अल्हड़तापूर्वक कूदती-फांदती हुई यहां पर ठहर कर एकदम शंत हो जाती है । यह मगरों एवं कछुओं का नैसर्गिक वास है ।  इस दरहा की ज्ञात गहराई २० मीटर है । इसमें उतरना खतरे से खाली नहीं है । यह झील पूर्वी दिशा में शबरी (कोलाब) नदी में समा जाती है । 

7. कक्ष क्रमांक ११५ :  इस कक्ष में पहाडी के उपर एक वाच टावर का निर्माण किया गया है जिससे की कांगेर घाटी का विहंगम दृश्य देखा जा सकता है।

8. कक्ष क्रमांक ६४ :  इस कक्ष से  राष्ट्रीय उद्यान एवं उडीसा के जंगलो का विहंगम दृश्य कोलाब नदी जो कि छत्तीसगढ  एवं उडीसा की सीमा रेखा बनाती है को देखा जा सकता है।

9. कक्ष क्रमांक ६६ :  इस कक्ष में कोलाब नदी एवं कांगेर नदी का संगम है। यह बडा ही रमणीक स्थान है जहॉं कोलाब नदी का मटियैला पानी कांगेंर नदी स्वच्छ पानी से मिलता है एवं यहीं से उडीसा की सीमा लगती है।

10. कक्ष क्रमांक ३२६ :  यह कक्ष भैंसा दरहा से क्योलांग जाने वाले रास्ते पर स्थित है। यहॉं एक वाच टावर का निर्माण किया गया है जहॉं से अभ्यारण्य क्षेत्र को देखा जा सकता है। 

11. कक्ष क्रमांक ५२ :  इस कक्ष में सागौन के चार बहोत ही मोटे वृक्ष स्थित है जिनकी छाती गोलाई लगभग ६ मीटर है इनका नाम राम, लक्ष्मण, भरत एवं सत्रुघन रखा गया है।

12. गुप्तेश्वर :  उड़ीसा सीमा रेखा के कोलाब नदी के किनारे यहा शिव मंदिर स्थित है। राष्ट्रीय उद्यान के माचकोट रेंज से यह सीमा लगी हुई है। छत्तीसगढ  एवं उडीसा से बडी संख्या में पर्यटक, श्रद्वालू शिव रात्रि के अवसर पे इस मंदिर का दर्शन करने हेतु जाते है। वन विभाग के द्वारा कोलाब नदी के उपर लकडी एवं बांस का पुल का निर्माण शिव रात्रि के समय किया जाता है जिससे की पर्यटक इस मंदिर तक पहुंच सके। मंदिर के अंदर गुफा है जिसमें स्टेलेग्माइट एवं ड्रिप स्टोन की आकर्षक संरचनायें है ।

राजवाडा:

बालाजी मंदिर :

अयप्पा मंदिर :

दंतेश्वरी मंदिर :

चित्रकुट जल प्रपात :

13. इंटरप्रटेशन केन्द्र :  यह कोटमसर वनग्राम में अवस्थित है , जिसका मूल उद्येश्य पर्यअकों को पार्क के वनस्पति एवं जैव जगत, वन्य प्राणियों सहित पार्क के तमाम घटकों की जानकारी देना है । जो अभी विकास की दिशा मे है । 

14. नेचर ट्रेल :  तीरथगढ  जलप्रपात मार्ग पर लगभग १.५ कि.मी. लंबा नेचर ट्रेल विद्यमान है । इस ट्रेल से गुजरने पर आपके सामान्य ज्ञान में नििश्चत रूप से बढोत्तरी होगी एवं आपको पैदल रहस्यमयी यात्रा का अनुभव प्राप्त   होगा । 

15. लोअर कांगेरवेली ड्राइव :  कोटमसर से कैलाश गुफा मार्ग में एक ओर कांगेर नदी इठलाती हुयी बहती है तो दूसरी ओर सघन वन एवं लताओं से आच्छादित ऊंचे पहाड  चुनौती देते हुये खडे है । यही है लगभग ७ कि.मी. की लोवर कोंगेर वैली की मनोरम एवं रमणीक यात्रा, जहां आप सब कुछ भूल कर अपनी सुध - बुध खो बैठेंगे ।

सामान्य जानकारी  कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान

क्षेत्रफल :

२०० वर्ग. कि.मी.

स्थिति :

जगदलपुर से २७ कि.मी.

अक्षांश :

१८.- ४५ दक्षिण से   १८०-५६ दक्षिण

देशांश :

८१०-५१ पूर्व   से   ८२०- १० पूर्व

स्थापना वर्ष :

१९८२

मुख्यालय :

संचालक कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान , जगदलपुर छत्तीसगढ़ भारत

अधीक्षक/परिक्षेत्र कार्यालय :

प्रतापपुर

तापमान :

न्यूनतम:  ३० सेल्सियस       अधिकतम : ४२० सेल्सियस

वर्षा :  

१५२ से.मी.

समुद्र तल से ऊंचाई :

७८१ मी. एम.एस.एल.

भ्रमण का समय :  

नवंबर से   जून (भ्रमण के लिए उपयुक्त समय :   मार्च से जून)

ठहरने की व्यवस्था

वन विश्राम गृह , कोटमसर :

२ सुट्

वन विश्राम गृह , नेतनार :

२ सुट्

वन विश्राम गृह , तिरथगढ :

२ सुट्

वन विश्राम गृह , जगदलपुरः

४ सुट् ५ डामेट्री  

निरीक्षण कुटीर , दरभा :

२ सुट्

आरक्षण :

संचालक , कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान , जगदलपुर , छत्तीसगढ   भारत

  वाहन सुविधा

हवाई मार्ग :

रायपुर , हैदराबाद , विशाखापटनम , भुवनेश्वर ।

  रेल मार्ग :  

सड क मार्ग :
विशाखापटनम
विजयवाडा
हैदराबाद
राजनांदगांव

रायपुर - जगदलपुर
जगदलपुर
जगदलपुर
जगदलपुर  
जगदलपुर

प्रवेश शुल्क

रु. १०.०० प्रति पर्यटक (बच्चे ५ वर्ष से कम निःशुल्क)
रु. १००.०० प्रति २० पर्यटक तक का समूह
रु. १००.०० प्रति विदेशी पर्यटक

वाहन शुल्क :

रु. २५.०० प्रति जीप एवं कार
रु. ५०.०० प्रति मिनी बस
रु. ०३.०० प्रति दुपहिया वाहन

कैमरा शुल्क :

रु. १०.०० प्रति सामान्य कैमरा
रु. १००.०० प्रति विडियो कैमरा

प्रकाश शुल्क :

रु. २५.०० प्रति गाइड दल

गाइड शुल्क :

रु. १५.०० प्रति ८ पर्यटकों का दल
रु. ०५.०० प्रति पर्यटक लेकिन रु. २५.०० न्यूनतम



गुरू घासीदास राष्ट्रीय उद्यान


गुरू घासीदास राष्ट्रीय उद्यान बैकुंठपुर, जिला कोरिया के बैकुंठपुर सोनहत मार्ग पर ५ कि.मी. की दुरी पर स्थित है। इसकी स्थापना सन्‌ २००१ में की गई थी , इसके पूर्व यह राष्ट्रीय उद्यान संजय राष्ट्रीय उद्यान , सिधी  मध्य प्रदेश का भाग था। इस राष्ट्रीय उद्यान का कुल क्षेत्रफल १४४०.७०५ वर्ग कि.मी. है। इस राष्ट्रीय उद्यान से हसदेव, गोपद एवं अरपा नदी बहती है। अरपा नदी का उद्गम इस राष्ट्रीय उद्यान के अंदर है। इसके अतिरिक्त नेऊर, बीजागुर, बनास,रेहंठ, नदीयों का जलग्रहण क्षेत्र यह राष्ट्रीय उद्यान है। 
यह राष्ट्रीय उद्यान उन्नत पहाडों एवं नदियों से घिरा हुआ है। यहां साल, साजा,धावड़ा, कुसुम, तेन्दु, आंवला, आम, हल्दु, जामुन, कर्रा एवं बांस के वृक्षों के अतिरिक्त जडी बुटियां पायी जाती है। इस अभ्यारण्य में बाघ,तेन्दुआ,गौर, चिंकारा,कोडरी, सांभर, भेडिया, उदबिलाव, चीतल, नीलगाय, जंगली सुअर, भालू, लंगूर, सेही, माउस डिवर,छिंद, भालू, चिरक माल खरगोश, बंदर, सिवेट, हायना, जंगली कुत्ता, सियार, लोमडी, आदि जानवर एवं मुर्गे, मोर, धनेश, महोख, ट्रीपाई, बाज, चील, डीयर, हुदहुद, किंगफिसर, बसंतगौरी, नाइटजार, उल्लू, तोता, बीइटर , बगुला, मैना, आदि पक्षी पाये जाते है।
इस राष्ट्रीय उद्यान के अंदर ३५ राजस्व ग्राम हैं जिनमें मुख्यतः चेरवा, पांडो, गोड़, खैरवार, अगरिया, जनजातियॉं निवास करती हैं। इनकी भाषा हिन्दी है। 
दर्शनीय स्थल :  
1.आमापानी : गोपद नदी का उदगम स्थल  है। यहां से ६ कि.मी. की दूरी पर हसदेव नदी का उदगम स्थल है। पहाड  एवं घाटी का विहगम दृश्य का आनंद लिया जा सकता है। 
2.खेकडा माडा हिलटाप : इस हिलटाप से सघन वन, घाटी एवं पहाड  का आनंद लिया जा सकता है। 
3.गांगीरानी माता की गुफा : यह रॉक कट गुफा है जहां गांगीरानी माता विराजमान है। गुफा के पास बहुत बडा तालाब है जिसमें सालों भर पानी रहता है। यहां रामनवमी के अवसर पर मेला लगता है। 
4.नीलकंठ जलप्रपात बसेरा :  सघन वन से घिरा हुआ १०० फीट से अधिक ऊंचाई से गिरता जलप्रपात है। यहां का विशाल शिवलिंग भी प्रमुख आकर्षण केन्द्र है। 
5.आनंदपुर :  आनंदपुर अपने नाम के अनुरूप सघन नदियों से घिरा रमणीक स्थल है। यह चारों ओर से ऊंचे-ऊंचे जल प्रपात एवं झरनों से घिरा मनोहारी स्थल है। 
6.बीजाधुर :  यह कल कल कर बहता हुआ सदाबहार पहाड़ी नदी है। यहॉं बैठकर सघन वन, एंव पक्षियों की कलरव एवं उनकी जलकीडा का आनंद लिया जा सकता है। 
7.सिद्धबाबा की गुफा :  सर्प देवता स्वरूप में सिद्धबाबा का निवास स्थल है यहां रामनवमी के दिन मेला लगता है। यहॉं लोग मन्नत भी मांगते हैं। 
8.च्यूल जल प्रपात : यह च्यूल से लगभग ५ कि.मी. की दूरी पर सघन वन से घिरा लगभग ५० फीट की ऊंचाई से गिरता सदाबहार जल प्रपात है। नीचे जल कुंड है जिसमें जलक्रिड ा का आनंद लिया जा सकता है। 
9.खोहरा पाट : यह च्यूल से लगभग २० कि.मी. है यह स्थान पाइंट हैलटाप पर है जहां खोहरा ग्राम बसा है। यहां से सघन वन, एवं घाटी का विहगंम दृश्य देखते ही बनता है। 
10.छतोडा की गुफा : यह एक रॉक कट छोटी गुफा है जिसमें ग्राम देवता की मूर्तियां हैं। 
11.नेउर नदी :  खोहरा पाट से नीचे उतरने पर सदाबहार कल-कल बहती नेउर नदी का चौडा पाट का नजारा देखते बनता है नदी जल गहरा है रोमांचक स्थल है।

क्षेत्रफल :

१४४०.७०५ वर्ग. कि.मी.

स्थिति :

बैकुण्ठपुर से ०५ कि.मी. (बैकुण्ठपुर- सौनहक मार्ग)

अक्षांश :

२३०- ३० दक्षिण से  २४०-०१ दक्षिण

देशांश :

८१०-४५ पूर्व  से  ८२०- ४५ पूर्व

स्थापना वर्ष :

२००१

मुख्यालय :

संचालक गुरू घासीदास राष्ट्रीय उद्यान, बैकुण्ठपुर, कोरिया, छत्तीसगढ़ भारत

सहायक संचालक :

गुरू घासीदास राष्ट्रीय उद्यान , बैकुण्ठपुर 

तापमान :

न्यूनतम :   १६.२० सेल्सियस         अधिकतम :  ३१.८० सेल्सियस

वर्षा :

९०० - १९७० से.मी.

समुद्र तल से ऊंचाई :

४८६ मी. एम.एस.एल.

भ्रमण का समय :

नवंबर से  जून (भ्रमण के लिए उपयुक्त समयमार्चसे जून)

ठहरने की व्यवस्था

वन विश्राम गृह, सोनहत 

सुट्

वन विश्राम गृह, रामगढ  

सुट्

वन विश्राम गृह, कोटाडोल

सुट्

वन विश्राम गृह, जनकपुर 

सुट्

आरक्षण 

संचालक, गुरू घासीदास राष्ट्रीय उद्यान, बैकुण्ठपुर, कोरिया, छत्तीसगढ  भारत

वाहन सुविधा 

पर्यटक अपने लिये जीप, कार बैकुण्ठपुर से किराये पर लेसकते है। वर्तमान में कोई भी शासकीय वाहन पर्यटकों के लिए उपलब्ध नहीहै।

प्रवेश शुल्क 

रूपये १५/- प्रति व्यक्ति
रूपये १५०/- प्रति विदेशी व्यक्ति
रूपये २००/- प्रति २० पर्यटकों का दल।

वाहन शुल्क 

 

कार/ जिप्सी/जीप 

५०/ रू. प्रति वाहन

मोटर सायकल 

०५/रू. प्रति वाहन

मिनीबस 

१००/रू. प्रति वाहन

कैमरा शुल्क 

२५/ स्थिर कैमरा

विडियो ग्राफी शुल्क 

 

६०००/रू. प्रतिदिन/ड्रॉक्यूमेंटरी

ड्रॉक्यूमेंटरी फिल्म की शूटिंग की अनुमति अपर प्रधानमुख्य वन संरक्षक वन्य प्राणी रायपुर द्वारा दी जावेगी।

पर्यटन गाइड 

६०/रू. प्रति गाइड



इंदिरा उद्यान


परिचय - मरवाही वनमंडल के वन परिक्षेत्र पेंड्रा में स्थित संरक्षित वनखंड अमरपुर के कक्ष क्रमांक १४०० में वर्ष १९७५ में इंदिरा उद्यान का निर्माण किया गया उद्यान का कुल रकबा ५२.५ हे० है। उद्यान में विभिन्न वर्षो में सागौन,यूकेलिप्टस, करंज, अर्जुन, शिशु , आंवला, बेर, अमरूद, नाशपाती, आम का वृक्षारोपण किया गया। इसके कुछ भाग में नर्सरी है। वर्ष १९९९ में उच्च तकनीकी सागौन रोपण किया गया। उद्यान का रखरखाव सही ढंग से न हो पाने के कारण जीर्ण शीर्ण अवस्था में था। वर्ष २००२-०३ में इसके पुनरूद्धार एवं नव निर्माण का कार्य वन विभाग द्वारा प्रारंभ किया गया। यह उद्यान स्थानीय लोगो के लिए पर्यटन एवं मनोरंजन का एकमात्र केन्द्र है। उद्यान में चार चांद लगाने के लिए पेंड्रा गढ़ी की रानी श्रीमती धनमत कुंवर द्वारा वर्ष १९९५में २.५ एकड का तालाब वन विभाग को दान में दिया गया। नव निर्माण के पश्चात निम्न दर्शनीय स्थल पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र है। 

दर्शनीय स्थल - 

1. जामवंत द्वार- सफेद भालू मरवाही के गौरव का प्रतीक है। इसी को ध्यान में रखकर वर्ष २००३ में उद्यान के मुख्य द्वार पर दो भालू की प्रतिमाएं स्थापित की गई है , जिसका वजन ११ मी० टन एवं ऊंचाई १५ फीट प्रति भालू है। इसका निर्माण छत्तीसगढ़ के ख्यातीलब्ध मूर्तिकार भिलाई निवासी श्री नेल्सन के द्वारा किया गया है। भालू की ये प्रतिमाएं छत्तीसगढ राज्य में अपने तरह की प्रथम एवं अनूठी कृति है। 

२ गुफा द्वार- इसका निर्माण वर्ष २००० में किया गया। रमणीक उद्यान में पहुंचने से पहले उसकी सुंदरता का आभास देता है। गुफा के अंदर दोनो तरफ पानी का झरना एवं राक्षस के मुंह में चलने की अद्भुत अनुभूति रोमांचित कर देती है। इसका निर्माण नेचर कम्प्यूटेक, रायपुर के निर्देशन में कराया गया है। 

३ हनुमान मंदिर- सनातन धर्म में आस्था का प्रतीक हनुमानजी का मंदिर एवं उनके सामने कुंआ दर्शनीय है। 

४ बाल उद्यान- उद्यान के इस भाग में लगे झूले , फिसल पट्टी छोटे बड़े सभी के आकर्षण का केन्द्र है। 

५ पगोड़ा- उद्यान के बीचों बीच स्थित पगोडा , पुनरूद्धार के पश्चात उद्यान की सुंदरता में चार चांद लगा रहे है। स्थानीय कलाकारों द्वारा निर्मित छत्तीसगढ के विभिन्न नृत्य दशाओं की आकृतियां दर्शनीय है।

६ फाउन्टेन- गुलाब गार्डन , नर्सरी के बीच कमल के फूल की आकृति पर गिरता हुआ पानी एवं रंग बिरंगी रौशनी से प्रत्येक पर्यटक आकर्षित है। 

७ वन्य जीव- पर्यावरणीय संतुलन में वन्य जीवों का विशेष महत्व है। यहां भालू , चितल , कोटरी , खरगोश एवं विभिन्न प्रकार के पक्षी रखें गये है। 

शीघ्र प्रारंभ हो रहा है - 

१ फिल्म शो- उद्यान में स्थित इको सेंटर में शीघ्र ही फिल्म शो प्रारंभ किया जा रहा है जिसमें वन्य जीव पर्यावरणीय शिक्षा , इको टूरिज्म वन संरक्षण , जल संरक्षण पर फिल्में दिखाई जावेंगी। 

२ नौका विहार - उद्यान में स्थित तालाब में शीघ्र ही नौका विहार प्रारंभ किया जा रहा है। 

३ शीघ्र ही यहां आने वाले पर्यटकों को वन्य जीवों को खुले क्षेत्र में विचरण करते देखने का अवसर मिलेगा। 

कैसे पंहुचें- 

रेल द्वारा- बिलासपुर कटनी मार्ग पर पेंड्रारोड स्टेशन से १० कि०मी० दुर है। स्टेशन से आटो या बस से जाया जा सकता है।  

सड़क मार्ग- गौरेला एवं पेंड्रा में होटल एवं धर्मशाला में रूका जा सकता है। उद्यान के मुख्य द्वार के निकट सिंचाई विभाग का विश्राम गृह भी है।



कानन पेण्डारी मिनी चिड़ियाघर


परिचय 

बिलासपुर वनमंडल के अंतर्गत बिलासपुर से मंडला / जबलपुर जाने वाली राज मार्ग पर ९ कि मी दूर कानन पेण्डारी स्थित है। वर्ष १९७५ में इस चिड़ियाघर का निर्माण किया गया। चिडियाघर का कुल रकबा १०६ हे० है। चिडियाघर में  विभिन्न प्रकार के वृक्ष है। जैसे  सागौन यूकेलिप्टस, करंज अर्जुन शिशु अकेशिया बेर अमलतास बबूल आदि के वृक्ष है। इसके अतिरिक्त समय-समय पर नारियल रूद्राक्ष चंदन कपूर नीम कदम खम्हार बांस आम कचनार सिल्वर ओक आदि पौधों का वृक्षारोपण किया गया है।  इसके कुछ भाग में ५ हेक्टयेर मेंद्ध  औषधि प्रदर्शन प्रक्षेत्र का निर्माण किया गया है जिसमें लेमन घांस सेक्ट्रनेला बच सर्पगंधा अश्वगंधा कालमेघ सतावर मसकदाना अडूसा अपामार्ज गुलाब काबली आदि के पौधे लगाये गऐ है। यह चिडियाघर स्थानीय लोगो के लिए पर्यटन एवं मनोरंजन का एकमात्र केन्द्र है। इस चिडि याघर  में निम्नानुसार मनोरंजन की व्यवस्था उपलब्ध की गई है 

क्र.

वन्य प्राणी का प्रजाति

नर/ मादा

चिड़ियाघर में नाम

शेर

मादा

ज्वाला

शेर

मादा

लावा

तेन्दूआ

नर

किशोर

तेन्दूआ

नर

लालू

तेन्दूआ

नर

लालू

तेन्दूआ

मादा

लालू

भालू

नर

गोपी

भालू

नर

लालू

भालू

मादा

जमुना

१०

भालू

नर

राजा

११

भालू

नर

नील

१२

भालू

मादा

गीता

१३

भालू

नर

नल

१४

भालू

मादा

मोना

१५

सफंद भालू

नर

जामवंत

१६

कोटरी

नर

मृगेन्द्र

१७

कोटरी

मादा

स्वर्ण

१८

कोटरी

नर

गजेन्द्र

१९

कोटरी

मादा

कृष्णा

शेरों के अलावा चिड़ियों का भी इनक्लोजर है जिसमें विभिन्न प्रकार की चिडि यां रखी गई है। इन चिडि यों का कलरव आपके मन को प्रफुल्लित कर देगा। इन चिडियों के नाम निम्नानुसार है -
दर्शनीय स्थल :
1.राजीव द्वार: यह चिड़ियाघर के अंदर स्थित बाल  उद्यान  का प्रवेशद्वार है। यहां से दर्शक बाल उद्यान के अंदर प्रवेश करते है। इस बाल उद्यान के अंदर विभिन्न प्रकार के झूले शीशा आदि है।
2.फब्बारा:   इसका निर्माण वर्ष सैलानियों को आकर्षित करने के लिऐ किया गया है। चिडि याघर के अंदर रास्ते पर चौराहे परद्ध यह फब्बारा स्थित है। इसके अतिरिक्त बाल उद्यान के अंदर भी एक फब्बारा है जो  घास के मैंदान में चार चांद लगा देता है एवं इसके किनारे बैठने वाले लोगों को गरमी में शितलता प्रदाय करता है। 
3.हाथी: बाल उद्यान के अंदर बच्चों के खेलने के लिए एक हाथी फिसल पट्टी का निर्माण किया गया है जिसके उपर चढ कर बच्चे फिसलते है एवं आनंद उठाते है।  
4. झूले: इस चिडियाघर के बाल उद्यान में विभिन्न प्रकार के झूले लगाये गये है। जिस पर बच्चे झूल कर आनंदित होते है।
5.ग्लोब:   उद्यान के अंदर तीन ग्लोब का भी निर्माण किया गया है जिस पर पयर्टक चढ कर उद्यान की सुंदरता निहारते है। 
6.शीशा: इस उद्यान में १० शी शा है। जिस पर  बच्चे  बैठ कर झूलने का आनंद उठाते है एवं अपने आप को संतुलित रखने का प्रयास करते है।  
7.टॉय टेन:   विद्युत से चलने वाले इस  टॉय टेन में ५ डब्बे है जिसमें २७ बच्चे बैठ कर उद्यान में घुमने का आनंद उठाते है। जाय राईट हेतु रूपय ५/- प्रति व्यक्ति टिकट दर लिया जाता है। 
8.वन्य प्राणी  इन्क्लोजर: इस चिड़ियाघर में २ शेर ३ तेन्दूआ ३ हाईना २ मगर ८ भालू २१९ चीतल ३ कोटरी २ बंदर ११ खरगोश एवं ८ गिनी पीग  २ मोर पक्षी ११० कोबरा सांप २ है। इन वन्यप्राणीयों के लिए अलग - अलग इनक्लोजर बनाये गये है जैसे-
क. टाईगर इनक्लोजर: केन्द्रीय चिडियाघर नई दिल्ली के मापदंड के अनुरूप टाईगरइनक्लोजर बनाया गया है। जिसमें ४ सेल का निर्माण किया गया है। टाईगर इल्कोजर काक्षेत्रफल २१००० वर्ग मीटर है। जिसके चारों ओर १८ फीट उंचाई के दीवाल एवं चैनलिंकजाली का घेरा निर्माण किया गया है सामने १८ फीट गहरी मोट का निर्माण किया गया हैजहां से शेर लावा एवं ज्वाला  का दर्शन किया जा सकता है।
ख. सफेद भालू इनक्लोजर: यहां भालू इनक्लोजर बनाया गया है। जिसमें ४ सेल कानिर्माण किया गया है। भालू इनक्लोजर का क्षेत्रफल १२००० वर्ग मीटर है। जिसके चारोंओर १२ फीट उंचाई के दीवाल का घेरा निर्माण किया गया है। सामने १२ फीट गहरी मोट का निर्माण किया गया है जहां से सफेद भालू जामवंत का दर्शन किया जा सकता है।
ग. तेन्दूआ इनक्लोजर:  तेन्दूआ इनक्लोजर में ४ सेल का निर्माण किया गया है।तेन्दूआू इनक्लोजर का क्षेत्रफल ४०० वर्ग मीटर है। जिसके चारों ओर १२ फीट उंचाई केचैन लिंक जाली का  घेरा निर्माण किया गया है।  
9.वन्य प्राणियों के चिकित्सा की सुविधाएं : वन्य प्राणी वाटिका में एक ObservationRoom एवं एक Quarantine Room की व्यवस्था की गई है। जहां बाहर से आये एवं बीमारवन्य प्राणियों का स्वास्थ्य परीक्षण किया जा सके। इस हेतु २ कमरों का निर्माण कियागया है। वन्य प्राणियों के स्वास्थ्य परीक्षण हर सप्ताह जिला पशु चिकित्सालय बिलासपुरके पशु चिकित्सक द्वारा किया जा रहा है।
10. दर्शको की सुविधा :  दर्शकों के लिये वन्य प्राणी वाटिका में आवश्यक सुविधाएं जैसेस्वच्छता, आरामगार, पीने की पानी की व्यवस्था उपलब्ध है। कानन पेंडारी उद्यान में इनआवश्यक सुविधाओं के उन्नयन की गई है। कानन पेंडारी का विकास सर्व सुविधाओं सेसम्पन्न छत्तीसगढ  के प्रथम शासकीय चिडि याघर की मान्यता प्राप्त हेतु प्रयास किया जारहा है। जिससे यह छत्तीसगढ  का सर्वश्रेष्ठ चिडि याघर के रूप में विकसित हो सके। 
इस चिड़ियाघर में पाये जाने वाले शेरों को चिडियाघर में दिये गये नाम से बुलाया जाताहै। जिस पर वों अपनी प्रतिक्रिया देते है। ये नाम निम्नानुसार है 

क्र

नाम

संख्या

चैटेरिंग लोरी

गोल्डन फिसेन्ट

आफ्रिकन पैरोट

यलो रिंग नेकट पैरोट

सिल्वर फिसेन्ट

लेडी ऐरेस्ट फिसेन्ट

नूरी

फेन टेल पिजन

कोकाटील

१२

१०

जावा स्पैरो

१३

११

लव बर्ड

३६

१२

बजरी

२०

१३

पीफॉल

१४

मूनमून

१५

लोकल डक

१६

लोकल पैरोट

१७

लोकल पीजन

१८

वाईट क्रो

१९

रोजी पेलिकन

२०

नाईट हिरोन

२१

बाज

इस चिड़ियाघर के समस्त वन्यप्राणियों को केन्द्रीय चिडि याघर प्राधिकरण के मापदण्डों के अनुसार केज एवं एनकोल्जर में रखा जाने का प्रयास किया जा रहा है साथ ही साथ यहां के वन्यप्राणियों को समुचित भोजन चिकित्सक के मार्गदर्शन में दिया जाता है।
चिडियाघर का उद्देश्य-
चिडियाघर का मुख्य उद्देश्य देश में पायी जाने वाली जैव विविधता से समृदध वन्य जीवों का संरक्षण एवं संवर्धन करना है। इसके अंतर्गत सर्वप्रथम ऐसी प्रजातियों का चयन किया जाता है जिनका प्राकृतिक आवास खतरे में आ गया है और उनके विलुप्त होने की प्रबल संभावनायें है। एैसे वन्य जीवों को चिडि याघरों में प्रजनन कराकर उनकी संख्या में वृदि करना तथा उपयुक्त समय पर उन्हें प्राकृतिक आवास में भेजना है। इसके साथ-साथ चिडि याघर के भ्रमण पर आने वाले पर्यटकों को वन्य प्राणियों के बारे में पूर्ण जानकारी देकर पारिस्थितिकीय संतुलन हेतु वन्य प्राणीयों के महत्व के बारे में अवगत कराना है। ताकि लोग जागरूक हो सके एवं उनकी सहानुभूति वन्य प्राणियों के संरक्षण में हो सके। टिकट दर २ साल से १२ साल तक के बच्चों का टिकट २ रूपये प्रति बच्चा व्यस्क ५ रूपये प्रति व्यक्ति। यहॉं एक केंटीन है जिसमें १० स्टाल बने हुये है इन स्टालों पर खान-पान चाय नास्ते आदि की भी बिक्री की जाती है। इस चिड़ियाघर के अंदर शहद प्रशंसकरण यंत्र लगाया गया है। यहां शहद को प्ररिशक्रित कर बाटलिंग किया जाता है। यहां शहद बिक्री करने हेतु एक काउन्टर भी है जहां से शहद / हरबल औषधी डब्लू डब्लू एफ के सामग्री जैसे - टोपी बैंग बैच बिल्ला डायरी कलेन्डर आदि बिक्री किया जाता है।


अचानकमार अभ्यारण्य बिलासपुर वनमंडल


अचानकमार अभ्यारण्य बिलासपुर जिले में स्थित है, यह अभ्यारण्य सतपुड़ा रेंज के मैकल पहाडि यों के बीच २२- २४ दक्षिण से २२ - ३५ दक्षिण देशांश एवं ८१- ३४ पूर्व से ८१-८५ पूर्व अक्षांश में स्थित है । इस अभ्यारण्य का कुल क्षेत्रफल ५५१.५५२ वर्ग किलोमीटर  है तथा इसकी स्थापना सन्‌ १९७५ में हुई । वर्ष १९९१ के पूर्व इस अभ्यारण्य में बांस  और काष्ठ का विदोहन एवं लघुवनोपज का संग्रहण किया जाता रहा है । 

अभ्यारण्य में २० प्रतिशत से अधिक साल एवं मिश्रित प्रजाति के वन है। इसके अतिरिक्त यहां बांस, साजा, बीजा, धावडा, कुसूम, लेंडिया, महुआ, तेन्दू, चार, आंवला, सलई, पलास, सेमल, कूल्लू आदि भी पाये जाते है ।  वनों से आच्छादित  इस अभ्यारण्य में शेर तथा तेंदुआ मुख्य मांसांहारी जीवों के अतिरिक्त गौर, सांभर, चीतल, चौंसिंघा, बार्किंग डियर, लंगूर, जंगली सुअर, भालू, उड ने वाली गिलहरी तथा सोनकुत्ता बहुतायत में पाये है । इसके अतिरिक्त यहां  मोर, मैना, कोयल, तोता, गिद्ध, बटेर, नीलकण्ठ, किंगफिशर, हरियाल चील, हुदहुद, सातबहेनिया, नाइटजार, तीतर आदि मिलते हैं ।
इस अभ्यारण्य में २२ वनग्राम है जिसमें मुख्यतः बैगा, गोंड जनजातियां निवास करती है । इन जन जातियों में बैगा जाति  की कुल आबादी लगभग ७० प्रतिशत है ।  २२  वनग्रामों की कुल आबादी ८२६५ है ।
दर्शनीय स्थलः- 
अचानकमार अभ्यारण्य जैव विविधता एवं वन्य प्राणियां की प्रचुरता से पूर्ण है । यह अभ्यारण्य अपने आप में एक दर्शनीय स्थल है । इस अभ्यारण्य के अंदर एवं इसके आस पास निम्नांनुसार दर्शनीय स्थान हैं, जिसे  देखकर पर्यटक हर्षित होते हैं ।
1.सिहावल सागर :- यह मनियारी नदी का उद्वम स्थल है यहॉं एक तालाब का निर्माण किया है जिसके मेड़ पर  वाच टवर लगाया गया है। इस वाच टावर से तालाब में आने वाले जलिय पक्क्षीयों को देखा जा सकता है। इस तालाब में मगरमछ भी है। अचानकमार से यह स्थान १२ कि.मी. दूर है।
2.पंडवानी तालाब :- एक पोराणिक तालाब है जहॉं एक  शिव मंदिर था जो आज खण्डहर हो चुका है । किंवदंती के अनुसार यह मंदिर पांडवों के द्वारा बनाया गया था। यह स्थान अचानकमार से ४५ कि.मी. दूर है।
3.लक्ष्मण पांव :- अचानकमार से १६ किमी. दूर यह स्थान स्थित है। यहॉं पहाड में दो गड्डे पाये जाते है। ऐसा कहा जाता है कि लक्ष्मण जी ने झुक कर यहॉं से बांण चलाया था ये दोनों गड्डे उनके पांव के निशान है। जंगल के बीच में स्थित यह स्थान बडा ही रमणीक है। गड्डे में पानी एकत्रीत होता है जिसका उपयोग वन्य प्राणियों द्वारा किया जाता है। 
4.नागबहरा :- नाग के समान दिखनेवाले यह पत्थर अत्यंत पुराना है। मान्यता है कि नागपंचमी के दिन नाग यहॉं दूध पीते है। अचानकमार से १० कि.मी.
5.लक्ष्मण डोंगरी :- मान्यता है रामचन्द्र जी ने यहां अपना वनवास का कुछ समय बिताया है । पुराने मुर्तियों के भाग्रावशेष यहॉं पाये जाते है। अचानकमार से ३० कि.मी.
6.मेंड्री सरई :- ४८० से.मी. परिधि का मृत साल वृक्ष यहॉं पाया जाता है । अचानकमार से ३० कि.मी.
7.अमरकंटक :- क्षेत्र का महत्वपूर्ण स्थल पावन नर्मदा नदी एवं सोनभद्र नदी का अद्गम स्थल है। इस स्थान का पोराणिक, धार्मिक एवं  ऐतिहासिक महत्व है । अभ्यारण्य सीमा से ३२ कि.मी.
8.वाच टावर :-
(क)  माझा डोंगरी - पूरे अभ्यारण्य का २/३ भाग का विहंगम दृश्य यहॉं से देखा जा सकता है। यहॉं एक वाच टावर का भी निर्माण किया गया है । इसकी ऊंचाई २१०० फीट है।
(ख)  झंण्डी डोंगरी - पूरे अचानकमार अभ्यारण्य का २/३ भाग का विहंगम दृश्य यहॉं से देखा जा सकता है। यहॉं एक वाच टावर का भी निर्माण किया गया है । इसकी ऊंचाई २३०० फीट है।    
(ग)  रक्षा साख - बिरारपानी के पास छत्तीसगढ़ - मध्य प्रदेश की सीमा पर स्थित है। यहॉं एक जल प्रपात सालों भर बहता है। यहॉं का दृश्य बहोत ही मनोरम है। पूरे अभ्यारण्य का २/३ भाग का विहंगम दृश्य देखा जा सकता है। यहॉं एक वाच टावर का भी निर्माण किया गया है । इसकी ऊंचाई २५०० फीट है। अचानकमार से १९ कि.मी.।
(घ)  टंगली पठार - अचानकमार से २३ किमी. दूर पहाडी के उपर यह स्थान है यहॉं एक वाच टावर का निर्माण किया गया है जिससे अभ्यारण्य का विहंगम दृश्य देखा जा सकता है।


बादलखोल अभ्यारण्य


जशपुर जिले में यह अभ्यारण्य जिला मुख्यालय से ७० किलोमीटर दूरी पर स्थित है। यह आरक्षित वनखण्ड पूर्व में जशपुर महाराज का शिकारगाह था। भौगोलिक दृष्टि से यह अभ्यारण्य २२०५२” से २३०३०” उत्तर अक्षांश से ८३०४४” से ८५०५७” पूर्व देशांश पर स्थित है। बादलखोल अभ्यारण्य कुल ३२ वनकक्षों का है, जिसका कुल क्षेत्रफल १०४.४५४ वर्ग किलोमीटर है। अभ्यारण्य का संपूर्ण क्षेत्र ईब एवं डोड़की नदी का जलागम क्षेत्र है। यह अभ्यारण्य १९७५ में बनाया गया था। इस अभ्यारण्य के अंदर चार वनग्राम है जिसमें ११८ परिवार निवास करते है। वनग्राम में ९० प्रतिशत लोगा अनुसूचित जाति एवं जनजाति के है।
 इस अभ्यारण्य में मुख्यतः साल एवं मिश्रित  प्रकार के वन है जिसमें साजा, धावडा, सलई, बीजा, खम्हार, हल्दू, अर्जुन, महुहा, तेन्दू, आंवला, चार, तिनसा, कर्रा, लेण्डिया आदि के पौधे पाये जाते है। औषधिय पौधे जैसे - सतावर, तिखरु, काली/सफेद मूसली, रामदातुन, चिरायता प्रचुर मात्रा में मिलती है। 
इस अभ्यारण्य में तेन्दूआ, चितल, कोटरी, जंगली सुअर, जंगली बिल्ली, भालू, लकड बग्घा, सियार, सेही, खरगोश, गोह, मोर आदि वन्यप्राणी पाये जाते है। इस अभ्यारण्य में बिहार एवं उड ीसा से आने वाले हाथियों के झुण्ड इस वनक्षेत्र को कोरिडोर के रूप में इस्तेमाल करते है।
इस अभ्यारण्य में पर्यटकों के मनोरंजन हेतु निम्नानुसार टे्रक्रिग रूट बनाये गये हैं जिस पर पर्यटक जाकर वन एवं वन्य प्राणियों का आनंद उठा सकते हैं।
ट्रेकिंग रूट :-
1. नारायणपुर, बेने, गुल्लू -१५ कि.मी.
2. बेन्द, रमकूट, कलिया, कुरहाटिकना, नारायणपुर - २६ कि.मी.
इस अभ्यारण्य के आस - पास दर्शनिय स्थल निम्नानुसार हैं -
बेने जलप्रपात-  नारायणपुर से १५ कि.मी. दूर ईब नदी पर स्थित है। 
गुल्लू जलप्रपात- नारायणपुर से १२ कि.मी. दूर ईब नदी पर स्थित है।
छुरी जलप्रपात- नारायणपुर से ११ कि.मी. दूर ईब नदी पर स्थित है।
कैलाश गुफा- अम्बिकापुर नगर से पूर्व दिशा में ६० कि०मी० पर स्थित सामरबार नामक स्थान है, जहॉं पर प्राकृतिक वन सुषमा के बीच कैलाश गुफा स्थित है। इसे परम पूज्य संत रामेश्वर गहिरा गुरू जी ने पहाड़ी चट्टानों को तराश कर निर्मित करवाया है। इस गुफा में शिव-पार्वती मंदिर बाघमाडा एवं अनेक लोक देवी-देवता के स्थान है। यहॉं महीने में शिव भक्त कावरियों द्वारा जलाभिषेक किया जाता है यहॉं प्रतिदिन सैकडों की संख्या में गहिरा गुरू जी के अनुयायी पूजा-अर्चना हेतु आते है। महाशिवरात्रि पर विशाल मेला लगता है। इस गुफा से लगा हुआ दो पहाडियों के बीच सुन्दर जलप्रपात जिसमें प्राकृतिक छटा मनमोह लेती है।
दर्शनीय स्थल- गुफा निर्मित शिव पार्वती मंदिर, बाघ माडा, बधद्रत वीर, यज्ञ मण्डप, जलप्रपात, गुरूकुल प्रांगण, संस्कृत विद्यालय और गहिरा गुरू आश्रम है।


बारनवापारा अभ्यारण्य


२४४.६६ वर्ग किमी. के क्षेत्रफल में फैला बारनवापारा अभ्यारण्य सन्‌ १९७६ में अस्तित्व में आया। इस अभ्यारण्य का नाम बारनवापारा गांव के नाम पर पड़ा है। यह अभ्यारण्य रायपर से ७० कि.मी. दूर  (रायपुर-संबलपुर मार्ग पर ) स्थित है। महानदी की सहायक नदियां यहां के लिए जलस्रोत हैं। बालमदेही नदी एवं जोंक नदी अभ्यारण्य से होकर बहती है। इस अभ्यारण्य में २२ वनग्राम है जिसमें मुख्यतः आदिवासी लोग निवास करते है। 

अभ्यारण्य के घने वनों को टीक, साल और मिश्रित वनों में बांटा जा सकता है। वन में सीधे तने वाले भव्य टीक (टेक्टोना ग्रांडिस) के साथ अन्य वृक्ष जैसे साजा (टर्मिनालिया टोमेन्टोसा), बीजा (टेरोकार्पस मार्सुपियम), लेंडिया (लेगरस्ट्रोमिया पार्विफ्लोरा), हल्दु (अदीना कार्डिफोलिया), धाओरा (आनोगेसिस लेटिफोलिया), सलई (बासवेलिया सेराट), आंवला (इंब्लिका अफिकीनालिस), अमलतास (केसिया फिस्तुला) आदि शामिल हैं। यहां वनों में बांस भी देखा जा सकता है। सफेद कुतु (स्टेरकुलिया यूरेअस) बरबस ही किसी का भी ध्यान आकर्षित कर लेता है। हरियाली के मध्य, अकेले खडे इन पेडों की छटा निराली है। 

इस अभ्यारण्य में शेर तेन्दूआ भालू गौर चीतल, सांभर, नीलगाय, जंगली शूकर लोमडी, धारदार लकड बग्घा आदि दिखते हैं। बारनवापारा में १५० से भी अधिक प्रजातियों के पक्षी पाए जाते हैं। इनमें प्रवासी पक्षी भी शामिल हैं। इनमें से कुछ हैं जंगली मुर्गे, फेजेन्ट, बुलबुल, ड्रोंगो, कठफोड वा आदि मुख्य हैं।

दर्शनीय स्थान-
1.तुरतुरिया: यह स्थान के सीमा पर स्थित है, यहां एक राम मंदिर है जहां से एक कुण्ड में झरना गिरता है जिससे तुरतुर की आवाज आती है। इसी आवाज के नाम पर इस स्थान का नामांकरण किया गया है। लोग यहां पूजा करने आते है।
2.देवधारा- देवपुर से २ कि.मी. की दूरी पर यह जलप्रपात स्थित है। बांस एवं मिश्रित वन से घिरा यह स्थान बहोत ही मनोरम है। यहां पर्यटक पिकनीक मनाने आते है।
3.शिवरीनारायण-  बारनवापारा से ५० कि.मी. की दूरी पर यह स्थान स्थित है। यहां एक शिव मंदिर है। यह शिव मंदिर महानदी के किनारे पर स्थित है एवं इसी स्थान पर महानदी एवं जोक नदी का संगम है। माघ पूर्णिमा के दिन श्रद्धालु संगम में नहा कर इस मंदिर का दर्शन करते है। 
4.सिरपुर- बारनवापारा से ४० कि.मी. की दूरी पर महानदी के तट पर यह स्थान स्थित है। यहां भगवान बुद्ध की प्रतिमा पाई गई है। यह स्थान छठे से दसवीं शताब्दी तक भगवान बुद्ध के श्रद्धालुओं का स्थान था। यहां बुद्ध विहार, स्वास्तिक विहार, गंगेश्वर महादेव मंदिर, लक्ष्मण मंदिर एवं संग्रहालय है जिसका आनंद पर्यटक उठाते है।
5.छाता पथरा- महराजी से १ कि.मी. दूर स्थित है। इस स्थान पर एक बड़ा सा पत्थर है जहां संत श्री गुरूघासीदास जी को ज्ञान प्राप्त हुआ था। जो कोई भी पर्यटक / श्रद्धालु गिरोद्धपुरी आता है वह इस स्थान का दर्शन अवश्य करता है।  
6.मातागढ- तुरतुरीया से २ कि.मी. दूर यह स्थान है। पर्यटक को यहा पहुंचने के लिए पैदल पहाडी पर चड ना पड ता है। पहाड ी के उपर देवी माता का एक मंदिर है। पुश पूर्णिमा के दिन श्रद्धालु यहां दर्शन करने आते है। 
7.तेलईधारा- बारनवापारा से १० कि.मी. दूर यह मनोरम स्थान है। यह स्थान बांस एवं साल के वन से घिरा हुआ है एवं बड ा ही रमणीक है। एक जलप्रपात यहां बहता है। पर्यटक यहां पिकनीक का आनंद ले सकते है।  
8.कुरूपाठा- सोनाखान से २ कि.मी. की दूरी पर यह स्थान स्थित है। यह एक पूजनीय स्थान है जहां लोग कुरूपाठ देव की पूजा करते है। इस स्थान पर पहुंचने के लिए एक १ कि.मी. पैदल चलना पड ता है तथा यह स्थान पहाडी के उपर स्थित है। यहां से दर्शक घाटी एवं वनों  का विहंगम दृश्य देख सकते है।
9.देवपुर पहाडी- देवपुर से लगी इस पहाडी के उपर तक का रास्ता ६ कि.मी. लंबा है। पर्यटक यहां के घुमावदार सड क साल सागौन, एवं बांस के वन का आनंद ले सकते है। पहाडी के उपर से देवपुर ग्राम, घाटी एवं वन संपदा का आनंद उठा सकते है।
10.सिद्धखोल- देवपुर से १२ कि.मी. की दूरी पर यह जलप्रपात स्थित है। यह मिश्रित वनों से घिरा हुआ है। जलप्रपात के पास ही एक मंदिर है जहां लोग दर्शन करते है एवं पिकनीक मनाने के लिए पिथौरा एवं कशडोल से इस स्थान पर आते है।


सेमरसोत अभ्यारण्य


यह अभ्यारण्य सरगुजा जिले के मुख्यालय अंबिकापुर से ५८ कि.मी. दूर अंबिकापुर - रामानुजगंज मार्ग पर स्थित है। इस अभ्यारण्य में सेंदरी, सेमरसोत, चनआन, सॉंसू, सेंन्दुर एवं मोगराही नदियों का जल प्रवाहित होता है। अभ्यारण्य के अधिकांश क्षेत्र में सेमरसोत नदी बहती है। इसलिए इसका नाम सेमरसोत पडा है। सेमरसोत अभ्यारण्य में साल, साजा, बीजा, शिसम, खम्हार, हल्दू एवं बांस के वन पाये जाते है। इसका क्षेत्रफल ४३०.३६ वर्ग कि.मी. है। इस अभ्यारण्य को सौंदर्यशाली बनाने में साल, आम, तेन्दू आदि वृक्षों के कुंज सहायक है। अभ्यारण्य में जंगली जंतुओं में शेर, तेन्दूआ, गौर, नीलगाय, चीतल, सांभर, सोनकुत्ता, भालू, कोटरी, सेही स्वछंद विचरण करते देखे जा सकते हैं। इस अभ्यारण्य में सफेद मूसली, ब्राम्हनी, तिखुर, भोजराज, हरजोर, बायबेरिंग आदि औषधि पौधे भी पाये जाते है। यह अभ्यारण्य नवंबर से जून तक पर्यटकों के लिए खुला रहता है। रात्रि विश्राम हेतु वन विश्राम गृह, सेमरसोत एवं पस्त का निर्माण कराया गया है। अभ्यारण्य में अनेक स्थानों पर वाच टावरों का निर्माण किया गया है। जिससे पर्यटक प्राकृतिक सुंदरता का आनंद ले सके। इस क्षेत्र के अन्दर दो वनग्राम है :- झलरिया, दलधोवा, पस्तआ,  

इस अभ्यारण्य के अन्तर्गत निम्नानुसार दर्शनीय एवं पिकनिक स्थल है -

1. चीतामाड़ा : यह स्थान अम्बिकापुर से रामानुजगंज पी.डब्लू.डी. मार्ग पर ६९/८ कि.मी. स्टोन से लगभग ५०० मीटर की दूरी पर सेमरसोत नामक नाला के किनारे स्थित है । सह स्थान कक्ष क्रमांक आर.एफ. ४९९ है बीट का नाम कण्डा पिश्चम में समाहित है । इस स्थान के बारे में ग्रामीणों का कहना है कि इस गुफा में कभी चीता वास करता था जिसके चलते इस स्थान का नाम चीता गुफा कहा जाता है। वर्तमान में गुफा का उत्पत्ति चट्टान धसक कर बंद हो चुका है। किन्तु यहां का स्थान नाला के किनारे चट्टानी होने के कारण यहां दूर-दूर से लोग अपने परिवार के साथ पिकनिक का आनंद प्राकृतिक वातावरण में उठाते है। 
2. परेवादाह : यह स्थान भी अंबिकापुर से रामानुजगंज पी.डब्लू.डी. मार्ग पर ७२ कि.मी. से लगभग २ कि.मी. अन्दर जंगल में सेन्दूर नदी में स्थित है । यह स्थान कक्ष क्रमांक आर.एफ. ५०० तथा बीट कण्डा पिश्चम में स्थित है । यह स्थान चारों तरफ से पहाड़ों से घिरा हुआ है तथा यह स्थान घनघोर जंगल से घिरा एवं गहराई में स्थित है , तथा पूरा नदी का क्षेत्र चट्टानी तथा पानी का दह (गहराई में एकत्रित पानी) होने के कारण यह दर्शनीय एवं पिकनिक स्पाट है । इस स्थान पर वर्षा पूर्व सांसद स्व. श्री लरंग साय जी ने नदी के तट पर बेल वृक्ष होने के कारण उसके नीचे शिवलिंग का स्थापना किए है । 
3. गौर उद्यान : यह स्थान अंबिकापुर से रामानुजगंज पी.डब्लू.डी. मार्ग पर स्थित अमझर नामक स्थान से सीतारामपुर ग्राम जाने वाले वनमाग्र से १४ कि.मी. की दूरी पर स्थित है । यह स्थान कक्ष क्रमांक आर.एफ. ४९३ में कण्डा पर्व में स्थित है । यह स्थान घना जंगल में गुफा है  यह स्थान गर्मियों में ठण्डा रहता है इस स्थान के बारे में लोगों का कहना है कि पिछले यहां गौर रहा करते थे । इस प्रकार यह स्थान दर्शनीय है । 
4. पवई जल प्रताप : यह प्रपात चनान नदी पर स्थित है । यह प्रपात लगभग १०० से भी ज्यादा ऊंचाई से गिरता है । इस प्रपात को धुआंधार कहा जाता है जब पानी ज्यादा आता है। यह स्थान अभ्यारण्य के कक्ष क्रमांक आर.एफ. ५२५ एवं बुद्धुडीह बीट में पडता है। इस स्थान तक पहुंचने के लिये बलरामपुर से जमुआटांड ग्राम तक वाहन से जाया जा सकता है । बलरामपुर से इस स्थान की दूरी १८ कि.मी. की है । 
5. तातापानी : यह स्थान अंबिकापुर से रामानुजगंज पी.डब्लू.डी. मार्ग पर स्थित है। यह स्थल अभ्यारण्य से बाहर है । यहां पर प्रचुर मात्रा में गरम पानी का स्रोत है। यहां पर भारत शासन द्वारा बोर किया गया है जिसमें बहुत ही फोर्स से गरम पानी ऊपर आता है। जिसके चलते यहां पर विद्युत उत्पादन करने का परियोजना प्रस्तावित है। 
6. बछराजकुंवर : यह स्थान प्रतापपुर परिक्षेत्र एवं धमनी परिक्षेत्र के सीमा पर आता है। यह स्थान के सीमा पर आता है । यह स्थान चलगली से १३ कि.मी. पर स्थित है। यह स्थान देव स्थान है तथा वन क्षेत्र के अन्दर है यहां १२ मास पूजा अर्चना श्रद्धालू आकर किया करते है। 


सीतानदी अभ्यारण्य


सीतानदी अभ्यारण्य का नाम अभ्यारण्य के अंदर बहने वाली नदी सीतानदी के नाम पर पड़ा है। इस अभ्यारण्य में उबड खाबड क्षेत्र तथा छोटी पहाडी यां उत्तम प्रकार के साल वन पाये जाते हैं एवं यहां सागौन के सफल रोंपण हैं। इसके अतिरिक्त साजा, बीजा, लेंदिया, हल्दू, धावडा, आंवला, सलई, अमलतास बहुतायत से अभ्यारण्य क्षेत्र में उपस्थित है।    

अभ्यारण्य के अंदर सोन्दूर नदी बहती है। इस नदी पर एक विशाल बांध तैयार किया गया है, जिसे सोन्दूर जलाशय के नाम से जाना जाता है । अभ्यारण्य में बाघ, गौर, चीतल, सांभर, नीलगांय, जंगली सुअर, सीयार, तेन्दुआ, भालू, सोनकुत्ता, शाही, जंगली बिल्ली, लकड बघा, चौरसिंगा, कोटरी पाये जाते है। इसके अतिरिक्त  अभ्यारण्य में १७५ से अधिक प्रजातियों के पक्षी दिखते हैं जैसे पी फाउल, जंगल फाउल, क्रो फिजेण्ट, बारबेट्स, बुलबुल, व्हीसलिंग टील, इग्रेट्स, हैरान आदि अभ्यारण्य में उड न गिलहरी आदि। अभ्यारण्य के अन्दर ३४ आदिवासी गांव स्थित है ओर लगभग इतने ही अभ्यारण्य की सीमा से लगे हुए ग्राम है । 

पर्यटक अपने निजी वाहन अथवा किराये के वाहन प्राप्त कर भ्रमण कर सकते है । 

दर्शनिय स्थल :     
सोन्ठुर जलाश्‍ाय- यह बांध सोन्ठुर नदी पर बनाया गया  हैं तथा यह अभ्यारण्य क्षेत्र की सीमा से लगा हुआ है। पर्यटकों के द्वारा यहां पिकनिक का आनंद उठाया जा सकता है।



तमोर पिंगला अभ्यारण्य


छत्तीसगढ़ के आदिवासी बाहुल्य सरगुजा जिले के उत्तर सरगुजा वनमण्डल में तमोर पिंगला अभ्यारण्य स्थित है। यह अभ्यारण्य अंबिकापुर से ९४ किलोमीटर दूर स्थित है। इसका कुल क्षेत्रफल ६०८.२७ वर्ग कि.मी. है। साल और मिश्रित वनों से आच्छादित और वर्ष १९७८ में स्थापित इस अभ्यारण्य का सम्पूर्ण क्षेत्र तमोर और पिंगला नामक वनखण्डों से बना है। जो सरगुजा जिले के उत्तर पिश्चम में स्थित है। रेहण्ड नदी इस अभ्यारण्य की दक्षिण-पिश्चम सीमा बनाती है। वहीं मोरन नदी अभ्यारण्य की उत्तरी सीमा बनाती है। समस्त क्षेत्र पहाडी, घने जंगलों और नदियों से घिरे होने के कारण मनोरम है।
इस अभ्यारण्य में प्रमुख रूप से शेर, तेन्दूआ जैसे मुख्य मांसाहारी वन्य प्राणियों के अतिरिक्त गौर, नीलगाय, सांभर, चीतल, भालू, जंगली सुअर, चिकार, कोटरी, लंगूर तथा बंदर आदि पाये जाते है। इसके अतिरिक्त पक्षियों में मोर, नीलकंठ, तोता, कोयल, जंगली मुर्गा, भृंगराज, बुलबूल, दूधराज,पपीहा, तीतर और मैना आदि दिखते हैं। वनों से आच्छादित इस अभ्यारण्य में साल, साजा, धावडा, महुआ, तेन्दू, अर्जुन, तिन्सा, हल्दू, आंवला, चार कारी, बांस, धवई और घोट आदि प्रजातियों के पेड  पौधे और वृक्ष यहां बहुतायत मात्रा में देखने को मिलते है। वन वर्गीकरण के आधार पर यह क्षेत्र शुष्क प्रायिद्वपीय साल वन और उत्तरी शुष्क मिश्रित पर्णपाती वन के अंतर्गत आता है। इस अभ्यारण्य क्षेत्र में ८ राजस्व ग्राम आते है। इन ग्रामों में मुख्यतः गोड , पण्डी, चेरवा, कोडकू और खैरवार जनजातिय निवास करती है। 
अभ्यारण्य क्षेत्र में वन्य प्राणियों और खूबसूरत मनोहारी दृश्यों के अलावा तमोर वन खण्ड की खड ी पहाडि यों और रेहण्ड नदी का विहंगम दृश्य भी मन को और भी आकर्षित कर देता है इस अभ्यारण्य में इस सबके साथ-साथ “देवी झिरिया” का मंदिर और यहां की नजदीक की पहाडी से बाहर महिने कल-कल करता हुआ और बहता हुआ पानी और भी आनंद की अनुभूति का एकसास कराता है। अभ्यारण्य के दर्शनीय स्थलों में “बेंगाची पहाड”, लेफरी घाट, सुईलना, घोडापाट, माल्हन देवी स्थल, कुदरू घाघ और केदू झरिया आदि स्थल है। तमोर पिंगला अभ्यारण्य में  भ्रमण का अत्यंत उपयुक्त समय नवंबर से जून तक महिना सबसे अच्छा होता है।
दशर्नीय स्थल : 
1.तमोर पिंगला अभ्यारण्य में निर्मित वाच टावर : अभ्यारण्य के विहंगम वन दृश्यों का अवलोकन करने हेतु अभ्यारण्य के वन क्षेत्रों में निम्न स्थलों पर वॉच टावर का निर्माण किया गया है :-
1.    पिंगला वनखण्ड, कक्ष क्रमांक १०२०
2.    पिंगला वनखण्ड, कक्ष क्रमांक ९८४
3.    पिंगला वनखण्ड, कक्ष क्रमांक ९६७
4.    पिंगला वनखण्ड, कक्ष क्रमांक ९६०
5.    पिंगला वनखण्ड, कक्ष क्रमांक ८९५
6.    पिंगला वनखण्ड, कक्ष क्रमांक ८३६
7.    पिंगला वनखण्ड, कक्ष क्रमांक ८२४
2.देवी झरिया (रमकोला) : देवी झरिया नामक स्थान रमकोला ग्राम के दक्षिण दिशा में एक पहाड़ी पर स्थित है। इस देवी स्थान पर पर्वतीय श्रॅंखलाओं से एक जल स्रोत प्रवाहित है। यह जलस्रोत देवी स्थान के पास से ही पहाडी के नीचे गिरता हैं। लोकजनों के बीच यहॉं की देवी पिंगला नाम से पूजित है। पिंगला देवी के नाम से ही इस जलस्रोत का नाम पिंगला नदी पडा हैं। इस स्थान के मनोहरता का आनंद लेने एवं देवी दर्शन हेतु वर्ष भर श्रद्धालुओं का आवागमन बना रहता है। अवन्तीकापुर-वाड्रफनगर सड क पर ११ नंबर मोड  पर पिश्चम दिशा में लगभग ३५ कि०मी० की दूरी पर स्थित है देवी झरिया। 
3.रेड नदी : रेहण्ड ;रेणुकाद्ध नदी का उद्गम स्थल जिला सरगुजा के मतरींगा पहाडी से जो लखनपुर वन परिक्षेत्र में है होता है। सैकडो किलोमीटर की दूरी तय करने के बाद ग्राम टमकी के पास जल प्रपात निर्मित करती है जिसे लफरी घाट के नाम से जाना जाता है। इस स्थल पर बलुई चट्टान ; महादेव सेन्ड रॉकद्ध में जल प्रवाह से बना कटाव एवं खडा किनारा इस स्थल के सुन्दतरा में चार चॉंद लगा देते है। जिसे देख कर मनमुग्ध हो जाता है। यहॉं जलप्रपात से बना जलाशय अत्यधिक गहरा एवं लगभग १ एकड  क्षेत्र में फैला है। इस रमणीय स्थल के चारों ओर दूर-दूर तक सघन वन फैला है। ग्रीष्म ऋतु में वन्य प्राणी इस स्थल पर पानी पीने के लिए बहुतायत में आते है। अभ्यारण्य के पिश्चमी सीमा पर स्थित स्थल से २५ कि.मी. तक सुरम्य वनक्षेत्र तमोर पिंगला अभ्यारण्य एवं गुरूघासी दास राष्ट्रीय उद्यान का कुछ क्षेत्र आता है।
अंबिकापुर से ग्राम रमकोला पी.डब्लू.डी. मार्ग पर ९५ कि.मी. की दूरी पर स्थित है। रमकोला से ग्राम इंजानी, टमकी वनमार्ग जो अभ्यारण्य के मध्य से गुजरती है पर कई दर्शनीय स्थल है। यहॉं से ३० कि.मी. की दूरी पर लफरी घाट (रेहण्ड नदी) स्थित है। माह नवम्बर से मार्च मध्य तक पर्यटन का उचित समय होता है। इस काल में वन क्षेत्र सुरम्य एवं मनमोहक होने के साथ तापक्रम भी पर्यटन के लिए उत्तम होता है।
4.मोरन नदी का तट :  मोरन नदी तमोर पिंगला अभ्यारण्य के उत्तरी सीमा का निर्धारण करती है। मानपुर वनखण्ड से निकलकर बोंगा ग्राम के पूर्व उत्तर से अभ्यारण्य सीमा निर्धारण प्रारंभ कर रेहण्ड नदी में ग्राम छतौली के पास संगम बनाती है। अभ्यारण्य सीमा पर इसकी लम्बाई लगभग ५० कि.मी. है। इस लम्बाई में दोनों ओर सुरम्य वनक्षेत्र स्थित है। घने वन क्षेत्र से गुजरने वाली यह नदी कई स्थलों पर मनमोहक दृश्य बनाती है। रमकोला से रघुनाथनगर वनमार्ग सुगम पहुंच मार्ग है जिसकी लम्बाई १६ कि.मी. है।
5.कुन्दरू घाघ : सरगुजा जिले के स्थानीय बोली में जलप्रपात को घाघी कहा जाता है। पिंगला नदी जो अभ्यारण्य के हृदय स्थल से प्रवाहित होती है, में कुदरूघाघ एक मध्य उंचाई का सुन्दर जल प्रपात रमकोला से १० कि.मी. की दूरी पर घने वन के मध्यम स्थित है। यह जल प्रपात दोनों ओर से घने जंगल से घीरा हुआ है। यह स्थल पारिवारिक वन भोज के लिए मनमोहक, दर्शनीय एवं सुरक्षित सुगम पहुंच योग्य है।
6.छिन्दगढ़ :  तमोर पिंगला अभ्यारण्य के तमोर पहाडी के वादियों में कक्ष क्रमांक ८२४ में छिंदगढ  नामक स्थान है। यहॉ पर विभाग द्वारा ५० फीट उंचा वॉच टॉवर कर निर्माण कराया गया है जिस पर चढ  कर दूर-दूर तक फैले मनमोहक प्राकृतिक दृश्यों का अवलोकन किया जा सकता है। गेम रेंज मुख्यालय से २० कि.मी. तकय कर यहॉं पहुंचा जा सकता है।
7.हाथी कैम्प धुरियॉ : विभाग द्वारा पकडे गये जंगली हाथियों में से सिविल बहादुर जो अम्बिकापुर के पास स्थित चेन्द्र ग्राम (लालमाटी) नामक स्थान पर प्रशिक्षण प्राप्त कर रहा था। अभ्यारण्य में ले जाने हेतु पन्ना राष्ट्रीय उद्वान से लाली हथिनी को लाया जा कर “लाली” एवं “सिविल” बहादुर को अभ्यारण्य के धुरियॉं कैम्प लाया गया। लाली राष्ट्रीय उद्यान पन्ना के रामबहादुर हाथी से गर्भवती हुई थी, तथा धुरियां कैम्प में आने के बाद एक मादा बच्चे को माह अप्रैल २००० में जन्म दी। जिसका नामकरण दुर्गा किया गया। दुर्गा के पिता का नाम रामबहादुर है। इस तरह से वर्तमान समय में हाथी कैम्पप धुरियॉं में तीन हाथी है।
8.सारूगढ़ एवं धोबा : अभ्यारण्य के तमोंर पहाडी पर क्रमशः कक्ष क्रमांक ८१८ एवं ८३६ में स्थित है। यह क्षेत्र घने साल वृक्षों से आच्छादित है। इस क्षेत्र में “गौर” निवास करते है। यहॉं विभाग द्वारा ५० फीट उंचा वॉच टॉवर का निर्माण कराया गया है जिस पर चढकर दूर-दूर तक फैले तमोर पहाडी के सुरम्य मनमोहक प्राकृतिक दृश्यों का अवलोकन किया जा सकता है। यहॉं पर गेम पेंज मुख्यालय से ४० कि.मी. की दूरी तय कर यहॉं पहुंचा जा सकता है।
9.ग्राम भेलकच्छ : तमोर पहाड ी पर पहुॅचने पर एक ऐसा स्थान पडता है जहॉं पर पर्यटक खडे होकर लगभग सैकडो फीट की उंचाई से भेलकच्छ ग्राम का विहंगम दृश्य देख सकते है।
10.बेंगची पत्थर : रमकोला-जनकपुर वनमार्ग जो अभ्यारण्य के मध्य भाग से गुजरता है के १५वें कि.मी. पर पिंगला वनखण्ड के कक्ष क्रमांक ९३२ में देखने पर पहाडी के एक चोटी पर प्राकृतिक रूप से चट्टान पर मेढ क तथा दूसरी चोटी पर चट्टान सर्प के समान दिखाई देती है, ऐसा प्रतीत होता है कि सर्प मेढ क को पकड ने का प्रयास कर रहा है।
11.घाट पेण्डारी : उत्तर सरगुजा वनमण्डल के प्रतापपुर वन परिक्षेत्र के अंतर्गत अम्बिकापुर-वाराणसी राजमार्ग पर स्थित है। घाट पेण्डारी में पूर्व समय में अत्यधिक चढाई था अब घाट कटिंग एवं पक्का मार्ग निर्माण हो जाने से यहॉं का मार्ग सुगम हो गया है। उक्त वन क्षेत्र में जंगली जडी बूटी बहुतायत में पाये जाते है जिसे लोक संरक्षित क्षेत्र बना कर संरक्षित किया जा रहा है। यहॉं सीमेंट कांक्रीट से एक वॉच टॉवर का निर्माण किया गया है जिस पर चढ कर दूर-दूर तक फैले सुरम्यद्व मनमोहक प्राकृतिक दृश्यों का अवलोकन किया जा सकता है।
मॉं बागेश्वरी देवी, कुदरगढ : अम्बिकापुर नगर के पिश्चम दिशा में लगभग ८० कि०मी० की दूरी पर प्राकृतिक सौन्दर्य से ओतप्रोत कुदरगढ़ पर्वत है। यहॉं राजा बालंदशाह सृजित मॉं बागेश्वरी की स्थापना चट्टानी गुफा में है। मॉं बागेश्वरी की मूर्ति कुदरती है, जिससे वे कुदरगढी नाम से प्रसिद्व है। मूर्ति के सामने चट्टानों के बीच छोटा गढ ढा है, जिसे देवी कुंड कहा जाता है। नवरात्रि में हजारों बकरे की बलि दी जाती है, पर इनका रक्त इस कुण्ड में कहॉं चला जाता है कोई नहीं जानता क्योंकि यह देवी कुण्ड भरता नहीं है। दर्शनीय स्थल - पहाडी के ऊपर राजा बालंदशाह का किला, कपिलधारा जल प्रपात, सूरज कुण्ड देवी और प्राकृतिक सौन्दर्य है। 
12.रकसगण्डा जलप्रपात : ओडगी विकासखंड में रकसगण्डा जल प्रपात चांदनी बिहारपुर के निकट बलगी नामक स्थान के समीप स्थित कई नदी पर्वत श्रृखला की ऊंचाई से गिरकर बलंगी के निकट रकसगण्डा जल प्रापत का निर्माण करती है। तब वहां ऐक संकरे कुंड का निर्माण होता है। यह कुंड लंबाई के लिए हुए अत्यंत गहरा है। कुंड में ऊंचाई से जल गिरने पर अनेक प्रकार की गैस निकलती है। इस कुंड से एक सुरंग निकल कर लगभग १०० मीटर तक गई है। यह सुरंग जहां समाप्त होता है, वहां एक विशाल जलकुंड बन गया है, जिसमें सूर्य रिश्मयों के संयोजन से रंग-बिरंगा पानी निकलता है। रकसगण्डा जल प्रपात अपनी विलक्षणता एवं प्राकृतिक सौंदर्य के कारण पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र बना रहता है। रकसगण्डा के जलकुंड में बडी मछलियां एवं जलचर जीवों का निवास है।  रियासत काल में अंग्रेज यहां मछलियों का शिकार करने आया करते थे।



भैरमगढ़ अभ्यारण्य


यह अभ्यारण्य बिजापुर जिले के भैरमगढ  नामक स्थान पर स्थित है। यह बिजापुर से ४८ कि.मी. दुर है। इस अभ्यारण्य का नाम ग्राम भैरमगढ  के नाम पर पडा है। इसका कुल क्षेत्रफल १३८.९५ वर्ग कि.मी. है। इस अभ्यारण्य से इंद्रावती नदी बहती है। इस अभ्यारण्य में  सागौन, अर्जुन, आंवला, जामुन, तिन्सा, धावडा, तेन्दु, बिजा, हर्रा, हल्दु, सलई, सेन्हा आदी के वृक्ष पाये जाते हैं। इसके अतिरिक्त यहां बांस एवं औषघिय पौधे भी पाये जाते हैं। इंद्रावती नदी के किनारे घांस के मैदान पाये जाते हैं, जिसका उपयोग वन भैसे के द्वारा किया जाता है। यह अभ्यारण्य वन भैसा के पाये जाने के कारण प्रसिद्व है। वन भैसे के अतिरिक्त इस अभ्यारण्य में शेर,तेन्दुआ,गौर, नीलगाय,चितल, साभंर, काकड, लोमडी, भालू, खरगोश, जंगली सुअर आदी वन्य प्राणी एवं विभिन्न प्रकार के पक्षी भी पाये जाते हैं। 
दर्शनीय स्थल :- इंद्रावती नदी के किनारे का दृष्य बडा ही मनोरम है, पर्यटक इस नदी के किनारे पर पिकनिक का आनंद ले सकते हैं। साथ ही इस अभ्यारण्य के सागौन, साजा, बांस आदी के वन देखने लायक हैं।


भोरमदेव अभ्यारण्य


यह अभ्यारण्य कवर्धा से २२ कि.मी. की दुरी पर स्थित है। भोरमदेव अभ्यारण्य जैव विविधता एवं वन्य प्राणी पर्यटन के दृष्टिकोण से छत्तीसगढ़ राज्य में अपना विशिष्ट स्थान रखता है। भौगोलिक दृष्टि से इसका विस्तार २२ डिग्री से २२ डिग्री १० पूर्व देशान्तर तथा ८० अंश से ८० अंश डिग्री अक्षांश के मध्य है। इस अभ्यारण्य का नाम सुविख्यात भोरमदेव मंदिर के नाम से रखा गया है। जिसका निर्माण ११वीं सदी में नागवंशी राजा गोपालवेद द्वारा कराया गया है। इसे वर्तमान में “छत्तीसगढ के खुजराहों” के नाम से जाना जाता है। इस अभ्यारण्य का गठन २००१ में किया गया है, इसका कुल क्षेत्रफल १६३.८० वर्ग कि.मी. है। 
भोरमदेव अभ्यारण्य मैकल पर्वत श्रृंखला में समुद्र सतह से लगभग ६०० मीटर से ८९४ मीटर की ऊंचाई में स्थित है। इसमें मुख्यतः साल तथा मिश्रित प्रजाति के वन है, कतिपय स्थानों पर सागौन के प्राकृतिक वन भी पाये जाते है। यह अभ्यारण्य विश्व विख्यात कान्हा टाईगर राष्ट्रीय उद्यान (कान्हा टाईगर रिजर्व) एवं चिल्फी बफर जोन के साथ जुडी होने के कारण और भी महत्वपूर्ण हैं। 
इस अभ्यारण्य के कक्ष क्रमांक ९४ से सकरी नदी निकलती है एवं कुछ दूरी पर संरक्षित क्षेत्र के अंदर बहने के पश्चात शिवनाथ नदी में मिल जाती है। भोरमदेव अभ्यारण्य में साल धावडा, मोदे, तेन्दू, थनवर, हर्राबरगा, कसही, कारी, सागौन, बहेडा, आम, जामुन, महुआ, बीजा, कुसुम, सेमल, शीशम, भवरमल, घाटा, तिन्सा, गिरची, जमरासी, चार, अमलताश, आंवला, लेण्डिया, रोरी, कुंभी, घोंट, बेल, पापडा, कांके, खम्हार पाये जाते है।
अभ्यारण्य के दक्षिण-पूर्वी भाग में नालों के किनारे बांस के भिर्रे उपस्थित है। मिश्रित वन मुख्यतः भोरमदेव अभ्यारण्य  के लगभग सम्पूर्ण क्षेत्र में मौजूद मिश्रित वन मुख्यतः IV श्रेणी के है। शीर्ष स्तरीय प्रजातियों में साल, बीजा, जामुनपानी, मोदे, हल्दू, धोबन, तेन्दू, कुम्भी, बहेरा, बरगद, साजा, हर्रा, महुआ, धावड़ा कुसुम, सलई, शिरश, मुण्डी, सेंमल, गुलर, केकड , आम, कसई, भंवरमाल मौजूद है। कतिपय स्थानों पर प्राकृतिक सागौन के छोटे-छोटे खंड भी मौजूद है और सागौन बिखरे प्रजाति के रूप में उपस्थित है, अधः स्तरीय प्रजातियों में अमलताश, लेण्डियाख् गिरचीबेल, कांके थंवर, गरूड , पापडा, घाटा, तिन्सा, कारीघोट, रोरी, आंवला, चटोल, बरगा, चार, मौजूद है।
भोरमदेव अभ्यारण्य कान्हा राष्ट्रीय उद्यान एवं चिल्फी बफर जोन के साथ जुडे होने के कारण तथा विशिष्ट भौगोलिक संरचना के कारण लगभग सभी वन्य प्राणी वर्गी का प्रतिनिधत्व करता है। यहां शेर (बाघ), तेन्दूआ, लगड बग्घा, जंगली, कुत्ता, भेडि या, गीदड , लोमडी, जंगली बिल्ली, चीतल, कोटरी, सांभर, नीलगाय, जंगली सुअर, वायसन (गौर), लंगुर, लाल मुंह का बंदर, नेवला, खरगोश, बिज्जू आदि जानवर पाये जाते है।
इस अभ्यारण्य में पर्यटकों के लिये टे्रकिंग रूट बनाया गया है जैसे :    
  • भंवरटोक एवं दुरदूरी के समीप सकरी नदी पर झरना (जल प्रपात) आकर्षण का केन्द्र है।
  • चिल्फी एवं सरोधा बोदलपानी मार्ग का मनोहारी दृश्य से आनंदित हुआ जा सकता है। 
इसके अलावा अभ्यारण्य क्षेत्र में भ्रमण के दौरान पहाड़ी एवं दुर्गम रास्तों में विभिन्न गुफाओं एवं मनोहारी प्राकृतिक दृश्य का आनंद लिया जा सकता है।
दर्शनिय स्थल : 
1. भोरमदेव- कवर्धा से १८ कि.मी. उत्तर पिश्चम में स्थित ११वीं शती का चंदेल शैली में बना भोरमदेव मंदिर अपने उत्कृष्ट शिल्प व भव्यता की दृष्टि से छत्तीसगढ का खजुराहों कहा जाता है। यह  इस क्षेत्र के सर्वाधिक पुनाने मंदिरों में से एक है। जनश्रुतियों के आधार पर भोरमदेव का मंदिर छत्तीसगढ में गोडो के शासन का महत्वपूर्ण स्मारक माना जाता है। किंतु ऐतिहासिक दृष्टि से यह मंदिर नागवंशियों का होना पाया गया है। भोरमदेव मंदिर छापरी नामक गांव के पास वृत्ताकार मैकेल पर्वत श्रेणियों के बीच घाटी में बना हुआ है। मंदिर के समीप ही एक जलाशय है जो आकर्षण का केन्द्र है। भोरमदेव मंदिर मूलतः विष्णु को समर्पित मंदिर था बाद में वहां शिवलिंग स्थापित कर दिया गया। भूमितल से सौ फुट उंचे इस मंदिर की बाह्‌य दीवारों पर अत्यंत आकर्षक मिथुन मूर्तिया हाथी  घोडे  नृत्यरत स्त्री-पुरूष गणेश नटराज इत्यादि की मूर्तियां स्थित है सम्प्रति भोरमदेव मंदिर पुरातत्व विभाग के देखरेख में है। यहां प्रतिवर्ष मार्च माह में “भोरमदेव उत्सव” का आयोजन किया जाता है।
2. मडवामहल- भोरमदेव मंदिर से आधा कि.मी. की दूरी पर चौरग्राम के समीप पत्थरों से निर्मित एक शिवमंदिर है। ऐसी जनश्रुति है कि इस मंदिर में विवाह संपन्न कराए जाते थे अतः विवाह मंडप के रूप में प्रयुक्त होने के कारण मंडवा मडल कहा जता है। मंदिर की बाह्‌य दीवारों पर मिथुन मूर्तियां बनी हुई है। गर्भगृह का द्वार काले चमकदार पत्थरों का बना है जिस पर आकर्षक प्रतिमाएं बनी हुई है।
3. छेरी महल - भोरमदेव मंदिर के समीप १ कि.मी. की दूरी पर एक छोटा शिवमंदिर है जो १४वीं शती का बना हैं मंदिर की चौखट काले पत्थरों की बनी है जिसके उपर आकर्षक भित्तचित्र बने है। गर्भगृह में गणेश प्रतिमा रखी हुई है।
4. हरमों - भोरमदेव से लगभग ४ कि.मी. दूर पहाड़ के तलहटी में बसे हरमों ग्राम में कवर्धा राजवंश का लगभग ३०० वर्ष पुराना भवन प्राचीन वास्तु शिल्प का अतिउत्तम उदाहरण है। यह स्थान पहले शिकारगाह के रूप में प्रयोग में लाया जाता था।
5. चिल्फी घाटी -  कवर्धा से लगभग ५० कि.मी. दूर समुद्र सहत से लगभग ७८० मीटर की उंचाई पर स्थित चिल्फी घाटी अत्यंत रमणीक स्थल है। इसे छत्तीसगढ  राज्य का प्रवेश द्वार भी कहा जा सकता है। सघन साल वन एवं वन्य प्राणियों के बहुतायत के कारण यह क्षेत्र अत्यधिक महत्वपूर्ण है। चिल्फी घाटी में ही फेन एवं हलोन नदी का उदगम है। वन्य पर्यटन के दृष्टिकोण से इस घाटी के विकास की अनन्य संभावनाएं मौजूद है।
6. गढ मियानर प्रपात- चिल्फी से लगभग १५ कि.मी. दूर कक्ष क्रमांक आर.एफ.५४/५५ के सीमा पर रानीदहरा ग्राम के पास यह रमणीक प्रपात है जहां ३ चरणों में लगभग ५० मीटर उंचाई से पानी गिरता है।
7. प्राचीन शिवमंदिर राज बेन्दा- चिल्फी से ४ कि.मी. दूर बालाघाट पी.डब्लू.डी. रोड से लगे राजबेन्दा वनग्राम में प्राचीन शिव मंदिर के भग्नावशेष है, जो भोरमदेव के समकालीन है। यहीं पर प्राचीन गणेश जी की मूर्ति भी स्थापित है।
8. सरोधा दादर- जिला मुख्यालय से ४६ कि.मी. दूर कवर्धा चिल्फी मार्ग से ४ कि.मी. अंदर दक्षिण दिशा में ३००० फुट उपर स्थित यह वन्य ग्राम दर्शनीय स्थल है। यहां  पर सौर उर्जा से संचालित दूर संचार केन्द्र सरकार के द्वारा स्थापित किया गया है। इस स्थान को पिकनिक स्थल के रूप में विकसित किया जा सकता है। चारों ओर पहाड  और वनों से आच्छादित सुरम्य जगह है।
9. रामचुवा- कवर्धा से ८ कि.मी. पिश्चम में जैतपुरी ग्राम के निकट प्राकृतिक मनोरम स्थल रामचुवा मैकल पर्वत की तलहटी में स्थित है। यहां पर प्राकृतिक जलस्त्रोत से निर्मित एक कुण्ड है जिसमें पानी कभी सुखता नहीं और जलस्त्रोत निरंतर प्रवाहमान रहता है। इस क्षेत्र में यह नर्मदा कुण्ड के नाम से विख्यात है इसे पर्यटक स्थल के रूप में विकसित किया जा सकता है। यहां से २ कि.मी. उत्तर में सरोदा बांध स्थित है।
10. बखारी गुफा- रामचुवा से मात्र २ कि.मी. की दक्षिण दूरी पर दक्षिण दिशा में बखारी नदी प्रवाहित होती है। इसी के तट पर बखारी कोन्हा नामक जगह स्थित है। यह स्थल दो पर्वत शिखरों के मध्य सकरी गलियारे से प्रकाश मार्ग द्वारा आधा कि.मी. अंदर तक प्रवेश किया जा सकता है। यहां पर शिवलिंग के आकार की प्रतिमा स्थित है। यह देव बखारी देव के नाम से प्रसिद्व है। यहां की सुरंग और पर्वतों की उंचाई देखते ही बनती है। यहां पर बहुत सारे लोग मनौती मांगने भी जाते है। इसे पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया जा सकता है।
11. झरना- कवर्धा से पूर्व दिशा में १२ कि.मी. की दूरी पर झिरना ग्राम में नर्मदा कुण्ड स्थित है जहां पर सुगंधित केवड़ो के झाडि यों के साथ सुरम्य अमराईयों के बीच यह स्थल पर्यटकों को आध्यात्मिक शांति का अनुभव कराता है। माघ पूर्णिमा को यहां मेला लगता है। छ.ग. शासन द्वारा झिरना नर्मदा कुण्ड को पर्यटन केन्द्र घोषित किया गया है।
12. रानीदहरा- कबीरधाम जिला मुख्यालय से जबलपुर मार्ग पर ३५ कि.मी. दूरी पर रानीदहरा नामक जल प्रपात स्थित है। रियासतकाल में राजा रानियां को मनोरंजन के लिए रानीदहरा लाया करते थे। रानीदहरा मैकल पर्वत के आगोस में स्थित है। तीनों ओर पहाडो से घिरे इस जगत पर ९० फीट की उंचाई पर स्थित जलप्रपात बर्बस ही लोगों गको आकृष्ट करता है।
13. चरण तीरथ- मैकल श्रेणियों पर ईश्वर की विशेष कृपा है। प्रभु ने इस श्रेणी में मनोरम और दर्शनीय स्थान बना रखे है। उनमे ंसे एक चरण तीरथ है। कवर्धा से ६३ कि.मी. दूर विकास खंड मुख्यालय बोड़ला से तरेगांव जाने वाली मार्ग स्थित यह एक दुर्गम स्थल है जहां ५७५ सीढि यों में से होकर मैकल श्रेणी चट्टानों से प्राकृतिक गुफा का निर्माण हुआ है। जिसमें निरंतर जल प्रवाह हो रहा है। यहां पर एक कुण्ड है जिसे भरत कुण्ड के नाम से जाना जाता है ऐसा कहा जाता है कि भगवान राम सीता की खोज में इसी मार्ग से होकर गुजरे थे जिससे उनके चरण का चिन्ह यहां आज भी विराजमान है। यह एक प्राकृतिक एवं सुंदर स्थान है, जो दर्शकों को सहसा ही अपनी ओर आकृष्ट करता है।
14. कंकालीन (सील पचराही)- बोड ला से तरेगांव मार्ग पर दक्षिण दिशा में स्थित दुर्गा मंदिर है। यहां पर अनेक मूर्तियां रखी गई है। जिनका संरक्षण सही ढंग से नही हो पा रहा है।
15. बम्हन दाई (पहाडो वाली मॉं)- कबीरधाम जिला के पंडरिया तहसील मुख्यालय से उत्तर दिशा में १० कि.मी. ओर कवर्धा मुख्यालय से ४३ कि.मी. की दूरी पर पंडरिया लोरमी मार्ग पर स्थित है। मैकल पर्वत शिखर पर मॉं बम्हन दाई का वर्तमान मंदिर का निर्माण श्री शिवराज दास मंहत ने करवाया था। यहां पर एक गुफा है जिसे ब्रम्ह गुफा के नाम से जाना जाता है जहां देवी की आकृति उत्कृष्ट है। यह मंदिर १००० मीटर उंचाई पर स्थित है।
16. श्री बकेला (चिंतामणी पार्श्वनाथ मंदिर)- पंडरिया से २० कि.मी. उत्तर दिशा में बकेला ग्राम स्थित है जहां पर पार्श्वनाथ की मूर्ति खुदाई से प्राप्त हुई है इसे स्थपित कर जैन तीर्थ के रूप में विकसित किया जा रहा है। खुदाई से प्राप्त २३ वें तीर्थकर पार्श्वनाथ की प्रतिमा १०वीं शताब्दी की बताई जाती है। हाफ नदी के तट पर सघन अभ्यारण्य के बीच स्थित बहुत ही मनोरम एवं उत्कृष्ट तीर्थस्थल है। यहां पर एक गुफा मिली है जिसे देवसर गुफा के नाम से जाना जाता है।
17. घोघरा (लघु भेडाघाट)- कवर्धा बिलासपुर मार्ग पर पांडातराई से ९ कि.मी. दूर पर पिश्चत में प्रकृति का मनोरम खजाना हाफ नदी तट पर प्राकृतिक रूप से निर्मित है। ३ जल प्रपातों के चट्टानों के मध्य गिरना भेडाघाट को लघु रूप में प्रदर्शित करता है।
18. स्वयंभू जलेश्वर महादेव, डोगरिया- कवर्धा से पंडरिया रोड पर २२ कि.मी. दूर ग्राम खरहट्टा से २ कि.मी. दूर हाफ नदी के तट पर भगवान शिवलिंग है। ऐसा कहा जाता है, यह लिंग स्वयंभू है। कण-कण में ईश्वर निवास करता है। इस रूप का प्रत्यक्ष प्रमाण यह डोंगरिया का शिवलिंग यह सुघर अमराईयों के बीच हाफ नदी के तट पर नदी के मध्य विराजमान है। यहां माघ पूर्णिमा में मेला भरता है।
19. कामटी- कवर्धा से कुकदूर मार्ग में मुनमुना से ८ कि.मी. दूरी पर कमाठी नामक ग्राम स्थित है। यहां राजवंशीकालीन अदभूत ८ फीट उंची नरसिंह भगवान की मूर्ति स्थापित है। यह मूर्ति एक अदभूत मूर्ति है। छत्तीसगढ़ में यह सारे भारत में पंजाब के सिवाय मात्र कमाठी में ही स्थित है। इसे पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया जा सकता है।


गोमर्डा अभ्यारण्य


रायगढ़  से ५२ कि.मी. दूर सारगढ  के पास गोमर्डा अभ्यारण्य स्थित है। प्रारंभिक गठन के समय (१९७५) गोमर्डा अभ्यारण्य का क्षेत्रफल मात्र १३३.३२ वर्ग कि.म. था। वन्य प्राणियों की बढ ती हुई संख्या भविष्य में उनके विकास और परिवर्धन की संभावनाओं को देखते हुए अभ्यारण्य क्षेत्र का विस्तार १९८३ में किया गया, वर्तमान में गोमर्डा अभ्यारण्य का कुल क्षेत्रफल २७७.८२ वर्ग कि.मी. हे। अभ्यारण्य का अधिकाश भाग पहाडी है। राठन बुढ ाघाट, गोमर्डा, दानव करवट दैहान आदि पहाडियॉं इस क्षेत्र के प्राकृतिक सौन्दर्य की अभिवृद्धि करती है, साथ ही वन्य प्राणियों के लिए प्राकृतिक वास स्थलों का निर्माण भी। लात, मनई आदि छोटी-छोटी जल प्रवाही नदियां इस क्षेत्र के वन्य जीवों की तृष्णा शांत करते हुए तटवर्ती क्षेत्रों को हरियालीपूर्ण विविधता प्रदान करती है। इस अभ्यारण्य में  २६ राजस्व एवं २ वन ग्राम हैं। 
गोमर्डा अभ्यारण्य क्षेत्र मुख्यतः उष्ण कटिबंधीय शुष्क पर्णपाती वनों से आच्छादित है। यत्र तत्र बांस के कुछ झुरमुट भी पाए जाते है। पर्वतीय ढलानों और शुष्क पठारों में वन सस्य का अभाव सा परिलक्षित होता है, किन्तु मैदानों भाग और घाटियों में अच्छे सघन वन कहीं-कहीं देखने को मिलते है। अभ्यारण्य में मुख्यतः साजा, धावरा, तेन्दू आचार, मिर्रा, महुआ, कर्रा, सलई, बीजा, ऑंवला, खम्हार, दोटा बेल, सेमर, हरसिंगार, धवई, कोरिया, बेर, पापडा इत्यादि के वृक्ष पाये जाते है। 
वानस्पतिक विविधता तथा प्राकृतिक संरचनाओं के अनुरूप इस अभ्यारण्य में अनेक प्रकार के वन्य प्राणि पाये जाते हैं जिसमें तेन्दुआ, लकड बघा, जंगली कुत्ते, सियार, लोमडी, भेडि या, जंगली बिल्ली आदि मांसाहारी जीव, गौर, नील गाय, साम्हर, चीतल, कोटरी आदि शाकाहारी जीव तथा सेही, गिलहरी, खरगोश, चूहे आदि कूतंक प्राणी उल्लेखनीय है। भालू जो सर्वभक्षी माना जाता है, इस अभ्यारण्य में बहुतायत में पाए जाते है। राष्ट्रीय पक्षी मोर, राज्य पक्षी दूधराज तथा अनेक रंग-बिरंगे पक्षी देखने को मिलते है।
भ्रमण के लिए उपयुक्त समय-  अक्टूबर माह से जून के बीच अभ्यारण्य क्षेत्र में भ्रमण किया जा सकता है।, किन्तु वन्य प्राणियों की सर्वाधिक परिदृष्टयता माह फरवरी से जून तक रहती है। ग्रीष्म में जल स्त्रोतों के आसपास वन्य प्राणियों के देखे जाने की संभावनायें काफी बढ जाती है।


पामेड़ अभ्यारण्य


यह अभ्यारण्य बिजापुर जिले के आवापल्ली ग्राम से ३३ कि.मी. दुर जगदलपुर - निजामाबाद स्थित है। इसका कुल क्षेत्रफल ४४२.२३ वर्ग कि.मी. है। इस अभ्यारण्य का नाम पामेड  ग्राम के नाम से रखा गया है। यह अभ्यारण्य पाच पहाड - मेटागुंडंम, कोरागुटटा, बलराजगुटटा, कोटापल्ली एवं डोलीगुटटा से घिरा हुआ है। इस अभ्यारण्य में तलपेरू, चिंतावगु नदी बहती है। इस अभ्यारण्य में साल, सागौन, अर्जुन, आंवला, जामुन, तिन्सा, तेन्दु, बिजा, हर्रा, हल्दु, सलई, सेन्हा आदी के वृक्ष पाये जाते हैं। इसके अतिरिक्त तलपेरू एवं चिंतावगु नदियों के किनारे घांस के मैदान पाये जाते हैं, जिसका उपयोग वन भैसे के द्वारा किया जाता है। यह अभ्यारण्य वन भैसा के पाये जाने के कारण प्रसि
द्व है। वन भैसे के अतिरिक्त इस अभ्यारण्य में शेर,तेन्दुआ,गौर, नीलगाय,चितल, साभंर, काकड , लोमडी, भालू, खरगोश, जंगली सुअर आदी वन्य प्राणी एवं विभिन्न प्रकार के पक्षी भी पाये जाते हैं।
दर्शनीय स्थल :- तलपेरू नदी का किनारा एवं चिंतावगु नदी के किनारे का दृष्य बडा ही मनोरम है पर्यटक इस नदी के किनारे पर पिकनिक का आनंद ले सकते हैं। साथ ही पांच पहाडों से घिरे इस अभ्यारण्य के साल,साजा आदी के वृक्ष इसकी सुदरता में चार चांद लगाते हैं।


उदन्ती अभ्‍यारण्य


उदंती अभ्यारण की स्थापना वर्ष १९८४ में हुई। इस अभ्यारण्य का कुल क्षेत्रफल २३७.२७ वर्ग किमी. है। छत्तीसगढ़ उडीसा से लगे रायपुर-देवभोग मार्ग पर यह अभयारण्य रायपुर से १४० कि.मी. की दूरी पर स्थित है। पिश्चम से पूर्व की ओर बहने वाली उदंती नदी के नाम पर इस अभयारण्य का नामकरण हुआ है। छोटे-छोटे पहाडियों की श्रृंखलाओं एवं उनके बीच फैली हुई मैदानी पट्टियों से इस अभयारण्य की विशेषाकृति तैयार हुई है। इस अभ्यारण्य में १० वनग्राम है जिसमें मुख्यतः जनजाति के लोग रहते है।
उदंती की लहाराती पहाडियां घने वनों से आच्छादित हैं। इन वनों में साजा, बीजा, लेंडिया, हल्दु, धाओरा, आंवला, सरई एवं अमलतास जैसी प्रजातियों के वृक्ष भी पाए जाते हैं। वनभूमि घास, पेडों, झाडियों व पौधों से ढंकी हुई हैं। अभयारण्य का उत्तरी-पिश्चमी भाग साल के वृक्षों से सुसज्जित है। फरवरी माह में उदंती नदी का बहाव रूक जाता है। बहाव रूकने से नदी तल में पानी के सुंदर एवं शांत ताल निर्मित हो जाते हैं। जिनमें वनभैंसा गौर शेर तेन्दुआ चीतल, सांभर, नीलगाय, जंगली सुअर सियार भालू, जंगली कुत्ते, जंगली बिल्ली, साही, लोमडी, धारीदार लकड बग्घा, देखे जा सकते हैं। शेर स्वभाव से शर्मीले होने की वजह से कम ही दिखाई देते हैं। उदंती में पक्षियों की १२० से भी ज्यादा प्रजातियां पाई जाती हैं, जिनमें कई प्रवासी पक्षी शामिल हैं। इनमें से कुछ हैं जंगली मुर्गे, फेजेन्ट, बुलबुल, ड्रोंगो, कठफोड वा आदि। उदंती संपूर्ण रूप से एक विशिष्ट अनुभव है।
दर्शनीय स्थल :
1.गोडेना जलप्रपात : यह जलप्रपात कर्रलाझर से ८ कि.मी. की दूरी पर स्थित है। यह स्थान बहोत ही मनोरम एवं एकांत में है जहां झरने की कलकल ध्वनी से पहाडी से बहती हुई सुनाई देती है। यह पर्यटकों के लिये पिकनीक का एक उत्तम स्थान है।
2.देवधारा जलप्रपात : तौरेंगा से १२ कि.मी. की दूरी पर यह जलप्रपात है। यहां पहुचने के लिये १.५ कि.मी. पैदल चलना पड़ता है। यह स्थान भी बहोत ही खुबसूरत है एवं यह बांस एवं मिश्रित वन से घिरा हुआ है। 
3.चंपारण : राजीम से १० कि.मी. की दूरी पर स्थित यह स्थान महाप्रभ भल्लभाचार्य का जन्म स्थलीय है। यहां २०वीं शताब्दी में मंदिर का निर्माण किया गया था, जनवरी तथा फरवरी के माह महिने में यहां मेला लगता है। पास ही एक पुराना शिव मंदिर भी है, जिसे चंपकेश्वर शिव मंदिर कहते है। श्रद्धालु यहां भगवान शिव की पूजा अर्चना करते है। 
4.राजिम : रायपुर से ४८ कि.मी. की दूरी पर मंदिरों का शहर राजिम स्थित है। इस स्थान को छत्तीसगढ का प्रयाग भी कहते है। यहां पैरी, सोन्डूर एवं महानदी का संगम है। इस स्थान पर राजीव लोचन मंदिर, कुलेश्वर मंदिर, पंचेश्वर एवं भुतेश्वर महादेव, शोमेश्वर महादेव आदि के मंदिर है।


Last Updated on : 19 September 2013 13:20:50 Copyright © 2013-14 Chhattisgarh Forest Department, All Rights Reserved. Site Powered by MIS CELL